
अनिमेष पाल, नईदुनिया, जगदलपुर। अगर यात्रा आपके लिए सिर्फ जगहें देखने का नहीं, बल्कि खुद से मिलने का तरीका है, तो बस्तर आपकी अगली मंजिल हो सकती है। छत्तीसगढ़ का यह आदिवासी अंचल आज भी उस भारत को सहेजे हुए है, जहां प्रकृति और मनुष्य के बीच कोई दीवार नहीं है। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की परिधि में बसे धुड़मारास और मांझीपाल गांव इसी बस्तर की सबसे शांत, सबसे शुद्ध और सबसे जीवंत नई पहचान बनकर उभर रहे हैं, जहां शांति दिखाई नहीं देती, महसूस होती है।
धुड़मारास और मांझीपाल की सबसे बड़ी पहचान बन रही है जंगल के बीच बहती कांगेर नाले की जलधारा पर बम्बू राफ्टिंग और कयाकिंग। यह रोमांच चीख-पुकार वाला नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ बहने वाला है। बांस से बनी राफ्ट पर नदी की धारा के साथ आगे बढ़ते हुए चारों ओर फैले साल और सागौन के जंगल, पक्षियों की आवाज और साफ नीला आकाश। यह सब मिलकर समय को जैसे धीमा कर देते हैं। यहां नेटवर्क भले कमजोर हो, लेकिन प्रकृति से जुड़ाव पूरी ताकत से होता है।
कयाकिंग युवाओं और एडवेंचर पसंद करने वालों के लिए नया आकर्षण है। हर पैडल स्ट्रोक के साथ नदी, जंगल और पहाड़ और करीब आते जाते हैं। यह बस्तर है, जहां रोमांच डराता नहीं, बल्कि भीतर तक सुकून भर देता है।
इन गांवों की सबसे बड़ी खासियत है यहां की बेहद शुद्ध हवा। एयर क्वालिटी इंडेक्स न्यूनतम स्तर पर रहता है। न धुआं, न ट्रैफिक, न मशीनों का शोर। सुबह जब जंगल से हल्की धुंध उठती है और सूरज की किरणें पत्तों के बीच से छनकर आती हैं, तो महसूस होता है कि सांस लेना भी यहां एक अनुभव है। शहरों की थकान और बेचैनी यहां खुद-ब-खुद उतर जाती है।
धुड़मारास और मांझीपाल में विकसित स्थानीय ग्रामीणों द्वारा संचालित होम-स्टे इस यात्रा को और गहरा बना देते हैं। मिट्टी और लकड़ी से बने घर, आसपास फैला जंगल, रात को झींगुरों की आवाज और ऊपर सितारों से भरा आसमान–यहां ठहरना किसी होटल में नहीं, बल्कि बस्तर के जीवन में रहने जैसा है।
होम-स्टे में मिलने वाला भोजन बस्तर की आत्मा से जुड़ा है। यहां की विख्यात चापड़ा चटनी, मौसमी कंद-मूल, देशी मुर्गा, देसी सब्जियां, महुआ आधारित व्यंजन, सल्फी और लांदा पेय स्वाद के साथ संस्कृति का परिचय कराते हैं। सबसे खास बात यह कि यहां पर्यटन का व्यावसायिक प्रोफेशनलिज्म अभी नहीं पहुंचा है—इसलिए जो मिलता है, वह बनावटी नहीं, बिल्कुल अपनत्व से भरा हुआ होता है।
धुड़मारास और मांझीपाल में बसती है धुरवा जनजाति, जिनकी संस्कृति आज भी अपनी मूल पहचान के साथ जीवित है। पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, मांदर की थाप, मिट्टी के घर और सामूहिक जीवनशैली—यह सब किसी सांस्कृतिक मंच का हिस्सा नहीं, बल्कि रोजमर्रा का जीवन है। यहां अतिथि-सत्कार औपचारिक नहीं, दिल से होता है।
धुड़मारास–मांझीपाल के साथ बस्तर की यात्रा तब पूरी होती है जब आप कोटमसर और कैलाश गुफाओं की रहस्यमयी दुनिया देखें, चित्रकोट, तीरथगढ़ और तामड़ा घुमर जलप्रपात की गर्जना महसूस करें, दंतेवाड़ा के मां दंतेश्वरी मंदिर में श्रद्धा से सिर झुकाएं, सांस्कृतिक नगरी बारसूर के प्राचीन मंदिरों में इतिहास को छुएं, सातधार जलप्रपात तक पैदल पहुंचें, ढोलकल गणेश तक ट्रैकिंग करें और साप्ताहिक जनजातीय हाट में बस्तर की असली रंगत देखें।
क्योंकि यहां पर्यटन दिखावा नहीं, अनुभव है। यहां शांति है, लेकिन सन्नाटा नहीं। यहां रोमांच है, लेकिन प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं। धुड़मारास और मांझीपाल बस्तर के वे गांव हैं, जहां आकर पर्यटक सिर्फ जगहें नहीं देखता–वह खुद को देखता है। शायद यही वजह है कि जो एक बार बस्तर आता है, वह बस्तर को जीवन भर अपने भीतर लेकर चलता है।
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बस्तर का मुख्य प्रवेश द्वार केशकाल घाटी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जगदलपुर तक नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। रायपुर एयरपोर्ट से सड़क मार्ग द्वारा लगभग 7–8 घंटे की यात्रा आपको मैदानों से जंगल और फिर पहाड़ों की दुनिया में ले जाती है। जगदलपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर धुड़मारास और मांझीपाल गांव सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचे जा सकते हैं। घने जंगल, घुमावदार सड़कें और रास्ते में दिखते छोटे गांव। यह सफर मंज़िल से पहले ही बस्तर से जोड़ देता है।