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डायबिटिक घावों का अब होगा पक्का इलाज छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिकों ने खोजा नया प्राकृतिक फार्मूला

एनआईटी रायपुर, रूंगटा यूनिवर्सिटी और मेडिकल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने 'होमोवेनिलिक एसिड' (एचवीए) नामक प्राकृतिक पदार्थ की मदद से डायबिटिक फुट और पुराने ...और पढ़ें

By T Surya RaoEdited By: Paritosh Dubey
Publish Date: Tue, 30 Jun 2026 10:13:21 AM (IST)Updated Date: Tue, 30 Jun 2026 10:16:02 AM (IST)
डायबिटिक घावों का अब होगा पक्का इलाज छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिकों ने खोजा नया प्राकृतिक फार्मूला
मेडिकल शोध में संलग्न रहीं वैज्ञानिक। नईदुनिया

HighLights

  1. एनआइटी रायपुर, रूंगटा यूनिवर्सिटी और मेडिकल कालेज रायपुर का शोध
  2. प्राकृतिक पदार्थ ‘एचवीए’ से संक्रमण रोकने और घाव भरने में मिली सफलता
  3. चूहों पर हुए परीक्षण में मिली सफलता, अगले चरण में होगा क्लिनिकल ट्रायल

नईदुनिया प्रतिनिधि , भिलाई। डायबिटीज के मरीजों के पैरों में होने वाले जिद्दी घाव, लंबे समय तक नहीं भरने वाले जख्म और कैथेटर से होने वाले संक्रमण के इलाज में जल्द ही बड़ी सफलता मिल सकती है। छत्तीसगढ़ के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्राकृतिक पदार्थ की पहचान की है, जो फंगस और बैक्टीरिया द्वारा बनाई जाने वाली संक्रमण की मजबूत परत (बायोफिल्म) को बनने से रोक सकता है। इससे संक्रमण नियंत्रित होने के साथ घाव तेजी से भरने की संभावना बढ़ जाती है।

इस महत्वपूर्ण शोध को दुनिया की प्रतिष्ठित आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की जर्नल आफ एप्लाइड माइक्रोबायोलाजी में प्रकाशित किया गया है। यह शोध एनआईटी रायपुर, रूंगटा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी और पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।


सबसे जटिल संक्रमण में भी कारगर

होमोवेनिलिक एसिड (एचवीए) पर केंद्रित रहा शोध शोधकर्ताओं ने होमोवेनिलिक एसिड (एचवीए) नामक प्राकृतिक पदार्थ पर अध्ययन किया। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पदार्थ फंगस और बैक्टीरिया के संयुक्त संक्रमण को कमजोर करने में सक्षम है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में सबसे जटिल और जिद्दी संक्रमणों में माना जाता है। रिसर्च की शुरुआत एनआईटी रायपुर की प्रयोगशालाओं में हुई, जहां कैंडिडा एल्बिकंस नामक फंगस और स्टैफिलोकोकस आरियस नामक बैक्टीरिया पर एचवीए के प्रभाव का परीक्षण किया गया। विभिन्न परीक्षणों और निगरानी प्रणालियों के माध्यम से यह पाया गया कि एचवीए संक्रमण की मजबूत परत बनने से रोकता है, जिससे संक्रमण फैलने की क्षमता काफी हद तक कम हो जाती है।

संक्रमित घावों पर जेल के प्रयोग में मिले सकारात्मक परिणाम

प्रयोगशाला में उत्साहजनक परिणाम मिलने के बाद शोध का अगला चरण रूंगटा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च में पूरा किया गया। यहां एचवीए आधारित जेल को संक्रमित घाव वाले चूहों पर लगाया गया। इलाज के दौरान घावों में सूजन कम होने लगी, संक्रमण नियंत्रित हुआ और मात्र 14 दिनों के भीतर घाव तेजी से भरने के संकेत मिले। साथ ही नई त्वचा बनने की प्रक्रिया भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

मेडिकल कालेज रायपुर ने की शोध परिणामों की पुष्टि

इसके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय, रायपुर के विशेषज्ञों ने माइक्रोस्कोपिक जांच के जरिए परिणामों का मूल्यांकन किया। जांच में पुष्टि हुई कि उपचार के बाद त्वचा तेजी से पुनर्निर्मित हो रही थी और संक्रमण का स्तर पहले की तुलना में काफी कम हो गया था। रूंगटा इंटरनेशनल स्किल्स यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने अध्ययन की रूपरेखा तैयार करने, आंकड़ों के विश्लेषण और शोध को अंतिम स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फंगस-बैक्टीरिया की खतरनाक साझेदारी को तोड़ता है एचवीए

शोध के दौरान यह भी सामने आया कि एचवीए फंगस और बैक्टीरिया के बीच बनने वाले उस जैविक गठजोड़ को तोड़ देता है, जिसकी वजह से संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है और सामान्य दवाओं का असर कम हो जाता है। यही कारण है कि पुराने घाव और डायबिटिक फुट जैसे मामलों में उपचार लंबा और जटिल हो जाता है।

अब होगा क्लिनिकल ट्रायल

वैज्ञानिकों के अनुसार अभी यह शोध प्रायोगिक स्तर पर सफल हुआ है और इंसानों पर इसका परीक्षण किया जाना बाकी है। अगले चरण में क्लिनिकल ट्रायल किए जाएंगे। यदि मानव परीक्षणों में भी सकारात्मक परिणाम मिलते हैं, तो भविष्य में एचवीए आधारित दवा या जेल विकसित की जा सकती है। यह नई तकनीक डायबिटिक फुट, पुराने घाव, कैथेटर से होने वाले संक्रमण तथा अस्पतालों में होने वाले जिद्दी संक्रमणों के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे एंटीबायोटिक दवाओं पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

शोध में इन वैज्ञानिकों का रहा योगदान

इस महत्वपूर्ण शोध कार्य में रूंगटा यूनिवर्सिटी के फार्मेसी विभाग के प्रोफेसर डा. संजय गुप्ता, एनआईटी रायपुर की डा. प्रतिमा गुप्ता तथा डा. अनमोल कुलश्रेष्ठ की प्रमुख भूमिका रही। तीनों संस्थानों के संयुक्त प्रयास से यह शोध सफलतापूर्वक पूरा किया गया।