
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। मोबाइल पर लगातार रील्स देखना, देर रात तक स्क्रीन चलाना और इंटरनेट पर जरूरत से ज्यादा समय बिताना युवाओं की मानसिक सेहत के लिए चिंता का विषय बन रहा है। इस समस्या के समाधान की दिशा में शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बिलासपुर ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है।
केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अधीन केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद की विद्यार्थी शोध योजना में छात्रा कीर्ति यदु की परियोजना को सर्वोच्च उत्कृष्ट श्रेणी मिली है। महाविद्यालय के रोग निदान एवं विकृति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ.अमित नामपल्लीवार के मार्गदर्शन में बीएएमएस द्वितीय वर्ष की छात्रा कीर्ति यदु ने यह शोध किया। प्राचार्य डॉ. जीआर. चतुर्वेदी का विशेष प्रशासनिक सहयोग मिला। शोध की अंतिम रिपोर्ट को राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट श्रेणी प्रदान की गई।
संस्थागत नैतिकता समिति की स्वीकृति के बाद अध्ययन को भारतीय नैदानिक परीक्षण पंजी में दर्ज कराया गया। महाविद्यालय के 200 विद्यार्थियों की जांच के बाद मानसिक समायोजन विकार के लक्षण वाले 35 विद्यार्थियों को 60 दिन के अध्ययन में शामिल किया गया।
इनमें 73 प्रतिशत छात्राएं थीं। प्रथम वर्ष के 20 से 22 वर्ष आयु वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या अधिक रही। उपचार के दौरान किसी तरह की दवा नहीं दी गई। आयुर्वेद की सत्वावजया चिकित्सा और आधुनिक तार्किक भावनात्मक व्यवहार चिकित्सा के मेल से प्रत्येक 15 दिन में परामर्श दिया गया।

विद्यार्थियों ने डिजिटल उपवास, उपकरण-मुक्त शयनकक्ष, भ्रामरी प्राणायाम, योग निद्रा और नियमित दिनचर्या अपनाई। इसके बाद औसत दैनिक स्क्रीन समय 5.63 घंटे से घटकर 3.48 घंटे और अवसाद मापांक का स्तर 15.93 से घटकर 7.5 रह गया।
मार्गदर्शक डॉ. अमित नामपल्लीवार ने आयुर्वेद के प्रज्ञापराध सिद्धांत के माध्यम से डिजिटल लत को समझाया। इसके अनुसार, हानिकारक परिणाम जानने के बाद भी गलत व्यवहार जारी रखना बौद्धिक भूल है। व्यक्ति की बुद्धि, आत्मसंयम और स्मरण शक्ति कमजोर पड़ने से वह मोबाइल इस्तेमाल करने की इच्छा पर नियंत्रण नहीं रख पाता। देर रात तक जागना, लगातार स्क्रीन देखना और दिनचर्या बिगाड़ना मानसिक असंतुलन बढ़ा सकता है।
शोध में विद्यार्थियों को मोबाइल से दूरी बनाने के लिए व्यावहारिक उपाय अपनाने को प्रेरित किया गया। सोने के कमरे को इलेक्ट्रानिक उपकरणों से मुक्त रखने, निश्चित समय तक मोबाइल से दूर रहने, भ्रामरी प्राणायाम करने और योग निद्रा का अभ्यास करने पर जोर दिया गया। सकारात्मक दिनचर्या अपनाने से आत्मसंयम मजबूत करने का प्रयास हुआ। प्रत्येक 15 दिन में हुए परामर्श सत्रों में विद्यार्थियों को अपनी आदतें पहचानने और उनमें सुधार करने के लिए प्रेरित किया गया।
अध्ययन में मानसिक स्वास्थ्य के साथ रक्त के कुछ मापदंडों की भी जांच की गई। श्वेत रक्त कोशिकाओं के विभिन्न प्रकारों की गणना वाली जांच में कुछ बदलाव सामने आने का उल्लेख किया गया। शोध रिपोर्ट के अनुसार, सूजन और एलर्जी से जुड़े कुछ कोशिकीय मापदंडों में कमी तथा न्यूट्रोफिल में वृद्धि दर्ज हुई। हालांकि, इन बदलावों को केवल परामर्श का परिणाम मानने से पहले अधिक प्रतिभागियों के साथ आगे अध्ययन और वैज्ञानिक पुष्टि आवश्यक है।
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