
नईदुनिया प्रतिनिध, बिलासपुर: महासमुंद जिले के सांकरा थाना क्षेत्र में नकली नोट रखने के आरोप में गिरफ्तार किए गए तीर्थराज प्रधान को विशेष एनआइईए अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश एनआइए सिराजुद्दीन कुरैशी की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी को नोटों के नकली होने की जानकारी थी और वह उन्हें असली के रूप में चलाने का इरादा रखता था।
अभियोजन के अनुसार एक फरवरी 2021 को एनएच-53 स्थित गुरु घासीदास चौक, सांकरा में वाहन चेकिंग के दौरान पुलिस ने तीर्थराज की मोटरसाइकिल की डिक्की से 100 रुपये के 100 और 500 रुपये के दो नोट बरामद किए थे। इसके अलावा 100 और 500 रुपये के एक-एक असली नोट तथा मोटरसाइकिल भी जब्त की गई थी।
आरोपित के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 489-सी के तहत अपराध दर्ज कर चालान पेश किया गया था। मामले में जब्त नोटों को बैंक नोट मुद्रणालय, देवास मध्यप्रदेश भेजा गया था। जांच रिपोर्ट में 100 रुपये का एक और 500 रुपये का एक नोट असली पाया गया, जबकि शेष नोट नकली घोषित किए गए।
सुनवाई के दौरान अदालत को यह खामिया मिलीं
सुनवाई के दौरान जब्ती के स्वतंत्र गवाह ऋषिकेश खूंटे और खेमलाल पाणिग्रही अदालत में अभियोजन का साथ नहीं दे सके। दोनों ने पुलिस की जब्ती कार्रवाई की पुष्टि नहीं की। अदालत ने पाया कि जब्ती के स्वतंत्र गवाहों ने बरामदगी का समर्थन नहीं किया। कथित वाहन चेकिंग से संबंधित रोज़नामचा और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। जब्त नोटों को सीलबंद किए जाने संबंधी स्पष्ट रिकार्ड नहीं था। नोट कहां से आए उनकी उत्पत्ति क्या थी और आरोपित का उनसे क्या संबंध था, इसकी जांच नहीं की गई। आरोपित को नकली नोटों की जानकारी होने या उन्हें चलाने के इरादे का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य पेश नहीं किया गया। मामले में शिकायतकर्ता और विवेचक दोनों की भूमिका एक ही पुलिस अधिकारी ने निभाई, जिस पर अदालत ने गंभीर टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर किया बरी
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 489-सी के अपराध में केवल नकली नोटों का कब्जा पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह भी साबित करना होता है कि आरोपित को नोटों के नकली होने की जानकारी थी और वह उन्हें असली के रूप में उपयोग करना चाहता था। वर्तमान मामले में यह आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं हो सका। अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोपित के विरुद्ध आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। इसलिए तीर्थराज प्रधान को धारा 489-सी के आरोप से दोषमुक्त किया जाता है।