
नईदुनिया प्रतिनिधि बिलासपुर। रेलवे परिक्षेत्र स्थित श्रीश्री जगन्नाथ मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, पुरी की शताब्दियों पुरानी परंपरा का जीवंत विस्तार है। वैसे तो हर दिन यहां भक्तों की भीड़ दर्शन के लिए उमड़ती है,लेकिन रथयात्रा पर माहौल देखने लायक होता है। यहां महाबाहु स्वरूप में विराजमान महाप्रभु भगवान जगन्नाथ इस वर्ष 29 जून को स्नान-दान पूर्णिमा पर 108 कलश, गंगाजल, पंचामृत और 64 औषधीय जड़ी-बूटियों से महास्नान करेंगे। इसके बाद परंपरा अनुसार 15 दिनों तक अणसार (विश्राम) में रहेंगे और फिर रथ पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
धार्मिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ माह भगवान जगन्नाथ का विशेष प्रिय मास माना जाता है। पुरुषोत्तम क्षेत्र पुरी में इसी अवधि में रथ महोत्सव आयोजित होता है। परंपरा है कि भगवान के विग्रह के लिए काष्ठ समुद्र मार्ग से इसी समय आया था और स्थापना भी आषाढ़ में हुई। जिस वर्ष दो आषाढ़ (पुरुषोत्तम मास) पड़ता है, उसी वर्ष नवकलेवर की पावन परंपरा भी संपन्न होती है।
रेलवे परिक्षेत्र में इस साल श्रीश्री जगन्नाथ मंदिर में स्नान-दान पूर्णिमा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। मंदिर समिति के अनुसार पूर्णिमा के दिन महाप्रभु संग भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी को महास्नान कराया जाएगा। मान्यता है कि वर्ष में केवल एक बार होने वाले इस महास्नान के बाद भगवान को ज्वर हो जाता है और वे 15 दिनों तक अनसर गृह में विश्राम करते हैं। इस अवधि में मंदिर के पट बंद रहते हैं तथा औषधीय उपचार की परंपरा निभाई जाती है। स्वस्थ होने के बाद महाप्रभु नगर भ्रमण के लिए रथ पर विराजमान होंगे।
इस साल 16 जुलाई को रथयात्रा है। रथ प्रतिष्ठा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा रेलवे क्षेत्र स्थित मंदिर से तितली चौक, रेलवे स्टेशन, तारबाहर, गांधी चौक, तोरवा थाना काली मंदिर होते हुए गुडिचा मंदिर पहुंचेंगे। नौ दिनों तक गुडिचा मंदिर में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। इसके बाद बहुणा यात्रा के साथ भगवान पुनः अपने मंदिर लौटेंगे। रेलवे क्षेत्र का यह मंदिर स्थापना काल से ही पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपराओं का जीवंत स्वरूप माना जाता है।
1996 से पुरी की परंपरा का जीवंत केंद्र
रेलवे परिक्षेत्र स्थित श्रीश्री जगन्नाथ मंदिर की स्थापना 26 नवंबर 1996 को हुई थी। स्थापना समारोह में जगन्नाथ पुरी के राजा दिव्य सिंहदेव और पुरी मंदिर के मुख्य पंडा रमेश राजगुरु शामिल हुए थे। तभी से मंदिर में पूजा-पद्धति, रथ महोत्सव, नवकलेवर और अन्य सभी प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुरूप संपन्न कराए जाते हैं।
27 साल पुराना रथ आज भी आस्था का आधार
मंदिर समिति के अनुसार 27 वर्ष पहले पुरी के कारीगर कुणना चंद्रा दास ने सरई की लकड़ी से 16 फीट लंबा, 17 फीट ऊंचा और 12 फीट चौड़ा रथ तैयार किया था। 101 फुट लंबी रस्सी से हजारों श्रद्धालु इसे खींचते हैं। पिछले छह वर्षों से उनके सहयोगी राजकुमार,सुदीप रथ निर्माण की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
महाबाहु रूप में विराजते हैं महाप्रभु
मंदिर के पुजारी गोविंद पाढ़ी के मुताबिक भगवान जगन्नाथ महाबाहु स्वरूप में विराजमान हैं, जो सभी भक्तों का खुली भुजाओं से स्वागत करने का प्रतीक माना जाता है। नीम की लकड़ी से बनी प्रतिमा का निर्माण पुरी के कारीगर गजेंद्र महाराणा ने किया था। भगवान के साथ ढाई फीट ऊंचे बलभद्र और दो फीट ऊंची देवी सुभद्रा की काष्ठ प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। वर्ष 2015 में नवकलेवर के दौरान नए विग्रह पुरी से लाए गए थे।