पुलिसिया मनमर्जी पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ब्रेक; बिना रजामंदी के नहीं होगा नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियां किसी...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 02 Jul 2026 01:36:23 PM (IST)Updated Date: Thu, 02 Jul 2026 01:36:23 PM (IST)
HighLights
- जबरन नार्को टेस्ट करना मौलिक अधिकारों का हनन
- रायगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
- ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने ही दर्ज होगी नार्को की रजामंदी
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियां किसी भी व्यक्ति पर ज़बरदस्ती नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग जैसी वैज्ञानिक जांच तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि ऐसी जांच केवल संबंधित व्यक्ति की पूर्ण सहमति और कानूनी सुरक्षा उपायों के पालन के बाद ही संभव है।
रायगढ़ के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र में हत्या और साक्ष्य छिपाने के मामले में पुलिस ने जांच के दौरान लक्ष्मीनारायण पटेल और श्रीमती अर्धना भगत को संदेही मानते हुए तलब किया था। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनका नाम न तो एफआईआर में है और न ही उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि पुलिस ने उन्हें बिना किसी नोटिस के 18 दिनों तक लगातार थाने बुलाया, लंबे समय तक हिरासत में रखा और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए। इतना ही नहीं, पुलिस ने उन्हें रायपुर ले जाकर बिना उनकी सहमति और बिना न्यायिक अनुमति के नार्को और ब्रेन मैपिंग टेस्ट के लिए मजबूर किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किए कड़े निर्देश
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले की मेरिट पर कोई टिप्पणी किए बिना, जांच एजेंसियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
सहमति सर्वोपरि: किसी भी व्यक्ति को वैज्ञानिक जांच के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसी जांच तभी होगी जब संबंधित व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से, पूरी जानकारी के साथ सहमति दे।
न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने प्रक्रिया: यदि जांच एजेंसी टेस्ट का प्रस्ताव रखती है, तो सहमति किसी सक्षम ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज की जाएगी। मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि सहमति किसी दबाव में नहीं, बल्कि पूरी तरह आज़ाद और सूचित है।
'सेल्वी' केस का हवाला: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'सेल्वी' मामले में निर्धारित कानून, एनएचआरसी (NHRC) की गाइडलाइंस और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के सुरक्षा उपायों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्ति की निजता और संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-अभिशंसन से संरक्षण) की रक्षा के लिए एक मील का पत्थर है। अब पुलिस के लिए किसी भी संदेही पर इन तकनीकों का प्रयोग करना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि अब हर कदम पर न्यायिक निगरानी अनिवार्य हो गई है।