नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने भू-विस्थापितों के रोजगार अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण के समय जो पुनर्वास नीति प्रभावी थी, रोजगार का अधिकार उसी के आधार पर तय होगा। बाद में लागू की गई नीति के आधार पर पहले से अर्जित अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने एसईसीएल द्वारा 13 मई 2022 को जारी उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें कोरबा जिले के नरईबोध निवासी लखनलाल राठौर का रोजगार संबंधी दावा खारिज किया गया था। हाई कोर्ट ने एसईसीएल को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के रोजगार के दावे पर अधिग्रहण के समय प्रभावी छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति के तहत विचार कर उचित निर्णय लिया जाए।
मामला एसईसीएल की गेवरा परियोजना के विस्तार के लिए कटघोरा तहसील के ग्राम नरईबोध की जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2009 में कोल बेयरिंग एरिया एक्ट के तहत जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी। वर्ष 2009-10 में अधिनियम की धारा 4, 7 और 9 के तहत अधिसूचनाएं जारी की गई थीं। याचिकाकर्ता लखनलाल राठौर की भी करीब 0.10 एकड़ जमीन इस अधिग्रहण में शामिल थी। उस समय छत्तीसगढ़ राज्य की पुनर्वास नीति प्रभावी थी, जिसमें प्रभावित परिवार के पात्र सदस्य को रोजगार देने का प्रविधान था। अधिग्रहण के बाद याचिकाकर्ता ने पुनर्वास नीति के तहत रोजगार की मांग की।
हालांकि, एसईसीएल ने बाद में लागू हुई कोल इंडिया लिमिटेड की पुनर्वास नीति-2012 का हवाला देते हुए दावा खारिज कर दिया। 2012 की नीति के अनुसार दो एकड़ से कम जमीन वाले भू-विस्थापितों को रोजगार के लिए पात्र नहीं माना गया था। इसी आधार पर एसईसीएल ने 13 मई 2022 को याचिकाकर्ता का आवेदन निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ता ने पुराने हाई कोर्ट फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शाश्वत गुप्ता ने हाईकोर्ट के प्यारेलाल बनाम एसईसीएल मामले में वर्ष 2017 में दिए गए फैसले का हवाला दिया। तर्क दिया गया कि जब जमीन का अधिग्रहण 2009-10 में हुआ था, तब राज्य की पुनर्वास नीति प्रभावी थी। इसलिए 2012 में बनी नई नीति को पिछली तारीख से लागू कर रोजगार का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
एसईसीएल की ओर से अधिवक्ता सुधीर कुमार बाजपेयी ने दलील दी कि जिलास्तरीय पुनर्वास समिति की बैठक में कोल इंडिया की 2012 की नीति लागू करने का निर्णय लिया गया था। एसईसीएल का कहना था कि दो एकड़ से कम जमीन वाले प्रभावितों को रोजगार देना संभव नहीं है और याचिकाकर्ता को अधिग्रहित जमीन का मुआवजा भी मिल चुका है।
‘प्यारेलाल’ फैसले को चुनौती नहीं दी गई थी
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एसईसीएल के अधिवक्ता से पिछले फैसले की स्थिति के बारे में जानकारी ली। एसईसीएल की ओर से स्वीकार किया गया कि प्यारेलाल मामले में हाई कोर्ट के वर्ष 2017 के फैसले को उच्चतर अदालत में चुनौती नहीं दी गई थी और वह निर्णय अंतिम हो चुका है। कोर्ट ने इसी तथ्य को महत्वपूर्ण माना और कहा कि समान परिस्थितियों वाले भू-विस्थापितों के मामले में पहले से तय कानूनी सिद्धांत की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अधिग्रहण के समय का अधिकार बाद की नीति से खत्म नहीं होगा
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय ने मामले में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और रोजगार के अधिकार से जुड़े पहलुओं पर विचार करते हुए कहा कि अधिग्रहण की तारीख पर लागू नीति ही रोजगार के दावे के निर्धारण का आधार होगी। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के संदर्भ में पुनर्वास और रोजगार के अधिकार के महत्व को रेखांकित किया। अदालत ने माना कि बाद में बनाई गई नीति के आधार पर पहले से अर्जित अधिकार को समाप्त करना उचित नहीं होगा।
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एसईसीएल का आदेश रद, 45 दिन में रोजगार दावे पर फैसला
हाई कोर्ट ने एसईसीएल के 13 मई 2022 के निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही एसईसीएल प्रबंधन को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के रोजगार संबंधी आवेदन पर अधिग्रहण के समय प्रभावी राज्य की पुनर्वास नीति के तहत नए सिरे से विचार करे।
कोर्ट ने यह प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 45 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि भूमि अधिग्रहण के बाद भू-विस्थापित के रोजगार अधिकार का निर्धारण बाद में बदली गई नीति से नहीं, बल्कि अधिग्रहण के समय लागू नियमों और नीति के आधार पर किया जाएगा।