निगम कर्मियों के नियमितीकरण पर हाईकोर्ट का आदेश! तीन महीने में तार्किक फैसला लें बिलासपुर कमिश्नर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एकलपीठ ने बिलासपुर नगर निगम में पदस्थ जागेश्वर दुबे व अन्य कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा आदेश जारी किया है।
Publish Date: Sun, 16 Aug 2026 05:41:45 PM (IST)Updated Date: Sun, 16 Aug 2026 05:41:45 PM (IST)
HighLights
- बिलासपुर निगम कर्मियों के नियमितीकरण पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश।
- नगर निगम आयुक्त को तीन महीने में तार्किक निर्णय लेने का निर्देश।
- कर्मचारियों को अतिरिक्त दस्तावेज सौंपने की दी गई स्वतंत्रता।
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुरः नगर निगम बिलासपुर में कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने सक्षम प्राधिकारी को कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर तीन महीने के भीतर तार्किक निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश जागेश्वर दुबे व अन्य की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया।
याचिकाकर्ताओं में नगर निगम बिलासपुर के अंतर्गत कार्यरत माली जागेश्वर दुबे, इलेक्ट्रीशियन चंद्र कुमार नागदौने, टाइम कीपर मिर्जा वाहिद बेग और माली पेट्रिक पास्टी शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उनकी सेवाओं का नियमितीकरण नहीं किया जा रहा है। उन्होंने इसे मनमाना बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के उल्लंघन का आधार बनाया था। उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग के 5 मार्च 2008 के परिपत्र के आधार पर समान और कनिष्ठ कर्मचारियों की तरह नियमितीकरण का लाभ दिए जाने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि नियमितीकरण के संबंध में नगर निगम बिलासपुर के कमिश्नर के समक्ष पहले ही अभ्यावेदन प्रस्तुत किया जा चुका है। लेकिन लंबे समय के बाद भी उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी मूल मांग को सीमित करते हुए हाई कोर्ट से केवल यह निर्देश देने का आग्रह किया कि सक्षम प्राधिकारी उनके लंबित अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार कर निर्णय लें।
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नगर निगम की ओर से पेश अधिवक्ता ने इस सीमित प्रार्थना का विरोध नहीं किया। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल ने याचिका का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने नगर निगम बिलासपुर के कमिश्नर यानी सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि प्रस्तुत अभ्यावेदन पर नियमानुसार विचार किया जाए और हाई कोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने के भीतर उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
अतिरिक्त दस्तावेजों के साथ अभ्यावेदन की भी छूट
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को यह स्वतंत्रता भी दी है कि यदि वे चाहें तो अपने दावे के समर्थन में सभी प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अतिरिक्त अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने नियमितीकरण के दावे के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। इसलिए सक्षम प्राधिकारी को अभ्यावेदन पर निर्णय लेते समय लागू नियमों और संबंधित शासन निर्देशों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करना होगा।