
रामकृष्ण डोंगरे, नईदुनिया रायपुर: प्रदेश में बस्तर और सरगुजा संभाग के साथ-साथ धमतरी, गरियाबंद, महासमुंद, कवर्धा, खैरागढ़-छुईखदान, राजनांदगांव और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जैसे जिले माओवादी हिंसा से मुक्त हो चुके हैं।
गुरुवार को राजनांदगांव-कांकेर बार्डर डिवीजन के अंतिम छह माओवादी भी मुख्यधारा में लौट आए। इन मैदानी जिलों में चलाए गए संयुक्त अभियानों और सतत कार्रवाई से यह बदलाव संभव हुआ है। 2023 से 2025 के बीच सुरक्षा बल ने इंटेलिजेंस आधारित आपरेशन तेज किए, जिसके परिणामस्वरूप माओवादी नेटवर्क कमजोर पड़ा और अंततः समाप्ति की ओर पहुंच गया।
पिछले 18 वर्षों में नगरी एरिया कमेटी, सीतानदी एरिया कमेटी सहित कई संगठन सक्रिय रहे, हालांकि उनका विस्तार सीमित रहा। समय-समय पर बैनर-पोस्टर और मुठभेड़ों से क्षेत्र में दहशत बनी रही। माओवादियों के खिलाफ सीआरपीएफ, बीएसएफ, डीआरजी और जिला पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाए, जिससे उनका प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर पड़ा। अब तक जिले में 17 माओवादी आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
सरगुजा संभाग में वर्ष 2003 के बाद माओवादी हिंसा का दौर तेजी से थमने लगा। उस समय बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक रहे एसआरपी कल्लूरी के नेतृत्व में सख्त और रणनीतिक अभियान चलाया गया। शुरुआती दौर में माओवादी झारखंड सीमा से लगे इलाकों में सक्रिय थे और ग्रामीणों की हत्या व विकास कार्यों में बाधा डालते थे।
पुलिस की प्रभावी रणनीति और लगातार अभियानों से दो-तीन वर्षों में माओवादियों की कमर टूट गई। इस दौरान सरगुजा रेंज के तत्कालीन आइजी अमरनाथ उपाध्याय की भूमिका भी अहम रही। छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्य झारखंड पुलिस के संयुक्त प्रयासों से घुसपैठ पर रोक लगी और अब पूरे संभाग में माओवादी गतिविधियां समाप्त हो चुकी हैं, जिससे शांति और विकास का वातावरण स्थापित हुआ है।
राजनांदगांव से अलग होकर बने नए जिले मोहला मानपुर अंबागढ़ चौकी में 1981-90 के दशक में माओवाद की लहर पहुंची थी। नक्सलबाड़ी से शुरू होकर तेलंगाना, बस्तर के रास्ते जल-जंगल-जमीन की लड़ाई का नारा यहां बुलंद हुआ और मोहला, मानपुर व औंधी इसका गढ़ बना। वर्ष 2009 में पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे सहित 29 जवान मानपुर के करीब कोरकोट्टी में माओवादियों के एंबुश में बलिदान हुए थे।
इसके बाद CRPF, ITBP की फोर्सेस के साथ संयुक्त बल ने यहां उन्नमूलन अभियान चलाया। साल दर साल माओवादियों का घेरा छोटा होता गया। लगभग 36 सालों के इस लाल पड़ाव का गुरुवार को कांकेर में माओवादियों के साथ अंत हो गया। यहां 36 साल तक रहा आतंक का साया, कोरकोट्टी में SP सहित 29 जवान बलिदान हुए थे