
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। शादी का झांसा देकर दुष्कर्म की शिकार 21 वर्षीय युवती को हाई कोर्ट ने गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म के आरोप से जुड़ा अनचाहा गर्भ जारी रखने के लिए पीड़िता को मजबूर करना उसकी शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा, निजता और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने के अधिकार को प्रभावित करेगा। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने राज्य शासन और बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देश दिया है कि युवती को एक सप्ताह के भीतर सरकारी अस्पताल में भर्ती कराकर चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी कराई जाए।
मामले के अनुसार, युवती ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण किया। आरोपी के दूसरी महिला से गुपचुप शादी करने की जानकारी मिलने पर उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस पर मस्तूरी थाने में अपराध क्रमांक 715/2026 के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में मामला दर्ज किया गया। चिकित्सकीय जांच में युवती के गर्भवती होने की पुष्टि हुई। पांच अक्टूबर 2026 की सोनोग्राफी में आठ सप्ताह का गर्भ बताया गया था।
मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात को बताया संभव
हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर को मेडिकल बोर्ड से युवती की जांच कराने का निर्देश दिया था। दो नवंबर को प्राप्त रिपोर्ट में गर्भ की अवधि 12 सप्ताह बताई गई। बोर्ड ने युवती की स्थिति सामान्य और चिकित्सकीय रूप से गर्भपात के लिए उपयुक्त बताई। रिपोर्ट में कहा गया कि जिला अस्पताल या उच्च चिकित्सा संस्थान में यह प्रक्रिया की जा सकती है।
हाई कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम, 1971 की धारा 3 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुष्कर्म के कारण गर्भ ठहरने की स्थिति में उससे होने वाली मानसिक पीड़ा को कानून गंभीर मानसिक क्षति मानकर चलता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए प्रजनन संबंधी निर्णय लेने और अपने शरीर के बारे में फैसला करने के महिला के अधिकार को भी रेखांकित किया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि युवती को एक सप्ताह के भीतर जिला अस्पताल, संबद्ध सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल या आवश्यक सुविधाओं वाले किसी अन्य सरकारी अस्पताल में भर्ती किया जाए। प्रक्रिया कम से कम दो स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन सहित योग्य चिकित्सकों की टीम करेगी। युवती की लिखित सहमति लेना अनिवार्य होगा। साथ ही इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए उसके पिता या अभिभावक की सहमति और सहमति-समर्थन भी लेने का निर्देश दिया गया है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को एंबुलेंस, अस्पताल में भर्ती, चिकित्सकीय समन्वय और उपचार की व्यवस्था करने कहा गया है। प्रक्रिया से पहले और बाद की पूरी चिकित्सा सुविधा दी जाएगी। जांच और अभियोजन के लिए जरूरी भ्रूण के ऊतक तथा डीएनए नमूने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सुरक्षित रखे जाएंगे। युवती की पहचान और निजता गोपनीय रखने तथा प्रक्रिया पूरी होने के दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश करने का भी निर्देश दिया गया है।