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प्रभावित हो रही छात्रों की पढ़ाई, जाति प्रमाण-पत्र के लिए छात्रों को नहीं भटकाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने अम्बिकापुर के छात्र मोहसिन अली और सिमरन बानो की याचिकाओं पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा...और पढ़ें

By Manoj Kumar TiwariEdited By: Manoj Kumar Tiwari
Publish Date: Thu, 02 Jul 2026 12:16:38 PM (IST)Updated Date: Thu, 02 Jul 2026 12:16:38 PM (IST)
प्रभावित हो रही छात्रों की पढ़ाई, जाति प्रमाण-पत्र के लिए छात्रों को नहीं भटकाया जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

HighLights

  1. दो मामलों में 30 दिन के भीतर निर्णय के निर्देश
  2. जाति प्रमाण-पत्र के लंबित मामलों पर 30 दिन में निर्णय लें तहसीलदार
  3. जाति प्रमाण-पत्र में देरी से प्रभावित हो रही छात्रों की पढ़ाई

नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर: हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जाति प्रमाण-पत्र के लिए आवेदकों को वर्षों तक इंतजार कराने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अंबिकापुर के दो छात्रों की ओर से दायर अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने संबंधित तहसीलदार और सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया है कि स्थायी जाति प्रमाण-पत्र के लंबित आवेदनों पर 30 दिनों के भीतर नियमानुसार निर्णय लिया जाए।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने यह आदेश मोहसिन अली और सिमरन बानो की याचिकाओं का निराकरण करते हुए दिया। दोनों याचिकाकर्ताओं ने 'दर्जी' (मुस्लिम) जाति के लिए स्थायी जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता मोहसिन अली की ओर से बताया गया कि उन्हें वर्ष 2022 में अस्थायी जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया था, लेकिन स्थायी प्रमाण-पत्र के लिए किया गया आवेदन अब तक लंबित है।


इसके कारण उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को मिलने वाले शैक्षणिक और वैधानिक लाभ प्राप्त करने में परेशानी हो रही है। वहीं सिमरन बानो ने अदालत को बताया कि उनके पास भी वर्ष 2022 में जारी अस्थायी प्रमाण-पत्र है और उनके पिता का जाति प्रमाण-पत्र वर्ष 1997 से बना हुआ है। इसके बावजूद स्थायी प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया जा रहा, जिससे उनकी पढ़ाई और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावित हो रहा है।

तर्कसंगत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से भी आवेदन के शीघ्र निराकरण पर सहमति व्यक्त की गई। इसके बाद हाई कोर्ट ने मामलों का अंतिम निराकरण करते हुए अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि आवेदन पर निर्णय लेने से पहले आवेदकों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाए। यदि किसी अतिरिक्त दस्तावेज या जानकारी की आवश्यकता हो तो उसकी सूचना समय रहते आवेदकों को दी जाए ताकि वे आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत कर सकें। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी को मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए तर्कसंगत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

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