बस्तर का 'फैंटम' अब मुख्यधारा में... कौन है 25 लाख का इनामी पापाराव, जो दशकों तक सुरक्षा बलों के लिए बना रहा पहेली?
जंगल, जो कभी उसका सबसे बड़ा कवच था, अब धीरे-धीरे उसके लिए सीमित होता दायरा बनता गया। अब वही ‘फैंटम’ मुख्यधारा में लौटने की राह पर है। ...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 24 Mar 2026 11:10:46 PM (IST)Updated Date: Wed, 25 Mar 2026 12:47:44 AM (IST)
पापाराव, शीर्ष माओवादी हिंसक। (फाइल फोटो)HighLights
- समर्पण की राह पर जंगल का ‘फैंटम’ पापाराव
- गांव का दोरला युवक जो बना खूंखार माओवादी
- घने जंगलों के बीच सुरक्षा बलों के लिए बना पहेली
नईदुनिया प्रतिनिधि, जगदलपुर। बस्तर के जंगलों में एक नाम वर्षों तक रहस्य और खौफ का पर्याय बना रहा-पापाराव उर्फ मंगू। दोरला जनजाति का यह युवक कभी गांव की साधारण जिंदगी जीता था, लेकिन हालात और विचारधारा के प्रभाव में 1990 के दशक के आखिर में उसने माओवादी संगठन का दामन थाम लिया। धीरे-धीरे उसने संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की और दंडकारण्य क्षेत्र के शीर्ष कमांडरों में शुमार हो गया।
उसकी सबसे बड़ी ताकत था बस्तर का जंगल। इंद्रावती से लेकर अबूझमाड़ तक का हर रास्ता, हर पगडंडी जैसे उसकी मुट्ठी में थी। यही वजह रही कि सुरक्षा बलों के लिए वह सालों तक ‘फैंटम’ बना रहा। फैंटम यानी ऐसा अदृश्य दुश्मन, जो मौजूद तो हो लेकिन कभी नजर न आए। पापाराव हर बार सुराग छोड़ता, लेकिन खुद हाथ नहीं आता था।
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दशकों तक सुरक्षा बलों के लिए बना पहेली
पापाराव की रणनीति कुख्यात कमांडर माड़वी हिड़मा से मेल खाती थी। सीधी मुठभेड़ से बचना, घात लगाकर हमला करना और आइईडी का इस्तेमाल। यही उसकी पहचान बन गई। कई बड़े हमलों में उसका नाम सामने आया, जिसने उसे संगठन का भरोसेमंद और खतरनाक चेहरा बना दिया।
लेकिन समय के साथ बस्तर बदलने लगा। लगातार ऑपरेशन, कमजोर होता माओवादी ढांचा और बढ़ते आत्मसमर्पणों ने हालात की दिशा बदल दी। जंगल, जो कभी उसका सबसे बड़ा कवच था, अब धीरे-धीरे उसके लिए सीमित होता दायरा बनता गया। अब वही ‘फैंटम’ मुख्यधारा में लौटने की राह पर है।
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कैसे बना जंगल का मास्टरमाइंड?
दोरला जनजाति से आने वाले पापाराव के लिए जंगल सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा था। बचपन से ही उसे इलाके की भौगोलिक बनावट, छिपे रास्तों और प्राकृतिक संकेतों की गहरी समझ थी। माओवादी संगठन से जुड़ने के बाद यही ज्ञान उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।
वह सुरक्षा बलों की गतिविधियों को पहले ही भांप लेता और घने जंगलों में इस तरह गायब हो जाता जैसे कभी वहां था ही नहीं। स्थानीय नेटवर्क, जनजातीय संपर्क और जंगल के भूगोल को मिलाकर उसने ऐसी रणनीति बनाई, जिसने उसे सालों तक पकड़ से बाहर रखा। शीर्ष नेतृत्व मुठभेड़ों में मारे गए। हथियार डाल दिए। पर पापाराव कभी पकड़ नहीं आया।
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हिड़मा जैसा पैटर्न, लेकिन अलग अंजाम
पापाराव की कार्यशैली काफी हद तक माड़वी हिड़मा से मिलती थी। दोनों ही घात लगाकर हमले करने, आइडी ब्लास्ट और जंगल आधारित गुरिल्ला युद्ध में माहिर माने जाते रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना रहा कि जहां हिड़मा अब मारा जा चुका, वहीं पापाराव ने बदलते हालात को समझते हुए आत्मसमर्पण का रास्ता चुना। यह बस्तर में कमजोर पड़ते माओवादी नेटवर्क और बढ़ते भरोसे का संकेत है। अब जंगल में बंदूक की गूंज कम और वापसी की आहट है।