नईदुनिया प्रतिनिधि, जांजगीर-चांपा : एक तरफ शासन-प्रशासन गांव-गांव में बेहतर स्वास्थ्य सुविधा का दावा कर रहा है, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मालखरौदा विकासखंड क्षेत्र में इन दिनों झोलाछाप डॉक्टरों की बाढ़ सी आ गई है। क्षेत्र में बिना किसी मेडिकल डिग्री और लाइसेंस के धड़ल्ले से क्लीनिक चल रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग ने आज तक इनकी पड़ताल तक नहीं की है। विभाग की इस चुप्पी पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं।
ग्रामीणों द्वारा बताया जा रहा है कि इनमें से अधिकांश संचालक 10वीं-12वीं पास हैं, जिन्होंने किसी बड़े अस्पताल में 2-3 साल कंपाउंडर का काम सीखा और खुद ही डॉक्टर बनकर क्लीनिक खोल लिया।
जानकारी के अनुसार क्षेत्र में दुकान के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा मिलते यहां सभी प्रकार के रोगों का सफल इलाज किया जाता है, अनुभवी डॉक्टर उपलब्ध, 24 घंटे सेवा ।अंदर न तो कोई डिग्री फ्रेम में लगी है, न ही पंजीयन प्रमाण पत्र। एक छोटी सी टेबल, एक बीपी मशीन, और 2-3 तरह के स्टेरायड वाले इंजेक्शन और एंटीबायोटिक - यही इनकी पूरी पूंजी है।
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क्यों फल-फूल रहे झोलाछाप सरकारी सिस्टम की नाकामी
ग्रामीणों में चर्चा के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण है सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरी। मालखरौदा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डाक्टरों की कमी, दवाइयों की किल्लत और रात में डॉक्टरों का न मिलना ग्रामीणों को इन झोलाछापों के पास जाने को मजबूर करता है।
रात-बिरात बुखार आने पर, पेट दर्द होने पर डाक्टर नदारद मिलने की बात सामने आ रही है जबकि झोलाछाप डाक्टर आधी रात को भी घर आकर बोतल चढ़ा देता है। 500-700 रुपये में तुरंत इलाज का लालच ग्रामीणों को फंसा रहा है।
इलाज के नाम पर जान से खिलवाड़, कई केस बिगड़े
इन झोलाछाप डाक्टरों के गलत इलाज से कई मरीजों की हालत बिगड़ने की भी चर्चाएं हैं। चर्चा के अनुसार, ये डाक्टर बिना जांच के ही टाइफाइड, मलेरिया, पीलिया का इलाज अपने हिसाब से कर देते हैं। एंटीबायोटिक का ओवरडोज, एक्सपायरी दवाइयां, एक ही सिरिंज का कई बार इस्तेमाल - जैसी गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। सबसे ज्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं और बच्चों को है। कई झोलाछाप क्लीनिकों में अवैध रूप से प्रसव तक कराए जाने की चर्चा है, जो मां और बच्चे दोनों की जान के लिए खतरा है।
विभाग की चुप्पी बनी रहस्य
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग पर है। जिले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) और ब्लाक मेडिकल आफिसर (बीएमओ) की जिम्मेदारी है कि वे समय-समय पर ऐसे फर्जी क्लीनिकों पर छापा मारें, लेकिन मालखरौदा में पिछले दो साल में एक भी छापेमारी की कार्रवाई नहीं हुई है।