मनोज कुमार दुबे, नईदुनिया, रायपुर। मैं छत्तीसगढ़ हूं। मेरी पहचान केवल धान के कटोरे, घने जंगलों और खनिज संपदा से नहीं है। मेरी मिट्टी में इतिहास की अनगिनत कहानियां दफन हैं। मैंने राजाओं के उत्थान और साम्राज्यों के पतन देखे हैं।
मेरे जंगलों में संघर्ष की गूंज रही है, तो मेरी धरती पर मंदिरों और स्थापत्य कला ने सभ्यता की अमिट छाप छोड़ी है। प्राचीन दक्षिण कोसल से लेकर आधुनिक भारत के एक महत्वपूर्ण राज्य बनने तक की मेरी यात्रा विरासत, वीरता और विकास की अनूठी गाथा है।
मेरे गर्भ में लौह अयस्क, कोयला और बॉक्साइट जैसे खनिजों का भंडार है, लेकिन मेरी असली समृद्धि केवल इन संसाधनों तक सीमित नहीं है। मेरी पहचान उन परंपराओं, संस्कृतियों और ऐतिहासिक धरोहरों से भी बनी है, जिन्होंने सदियों से मुझे एक विशिष्ट स्वरूप दिया है।
36 गढ़ों से बनी मेरी पहचान
मेरे नाम के पीछे भी इतिहास की एक दिलचस्प कहानी है। माना जाता है कि इस क्षेत्र में 36 किले या गढ़ होने के कारण मेरा नाम छत्तीसगढ़ पड़ा। रायपुर जिले के गजेटियर (1973) में उल्लेख मिलता है कि इनमें से 18 गढ़ शिवनाथ नदी के उत्तर और 18 दक्षिण दिशा में स्थित थे। हालांकि, मेरे नाम को लेकर एक दूसरा मत भी प्रचलित है। इसके अनुसार, छत्तीसगढ़ शब्द चेदिशगढ़ का अपभ्रंश है, क्योंकि यह क्षेत्र लंबे समय तक चेदि राजवंश के अधीन रहा था। मेरे नाम की उत्पत्ति को लेकर भले ही अलग-अलग मान्यताएं हों, लेकिन एक बात निर्विवाद है कि मेरी ऐतिहासिक पहचान सदियों पुरानी है।
दक्षिण कोसल से राजवंशों की गौरवगाथा तक
मेरी कहानी प्राचीन दक्षिण कोसल से शुरू होती है। इतिहासकारों के अनुसार, वर्तमान छत्तीसगढ़ का भूभाग दक्षिण कोसल, महाकांतार और दण्डकारण्य जैसे ऐतिहासिक क्षेत्रों से जुड़ा रहा है। बस्तर का वन क्षेत्र प्राचीन महाकांतार का हिस्सा रहा है।
मेरी धरती ने अनेक महान राजवंशों का शासन देखा है। देशज राजर्षितुल्य, शरभपुरीय, पाण्डुवंश, नलवंश, छिंदक नागवंश, फणीनागवंश, सोमवंश और कलचुरी वंश ने यहां अपनी सत्ता स्थापित की। इन राजवंशों के शासनकाल में मंदिरों, किलों और स्थापत्य कला का विकास हुआ।
आज भी मेरी धरती पर मौजूद ऐतिहासिक धरोहरें उस गौरवशाली अतीत की गवाही देती हैं। इन स्मारकों को देखकर महसूस होता है कि मेरा इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का वृत्तांत नहीं है, बल्कि कला, संस्कृति और स्थापत्य के विकास की कहानी भी है।
मराठों से अंग्रेजों तक, संघर्ष की धरती
समय बदला और मेरे इतिहास में नए अध्याय जुड़ते गए। मध्यकाल में यह क्षेत्र मराठा शासन के अधीन आया। स्थानीय रियासतों और जमींदारों ने यहां के प्रशासनिक ढांचे को आकार दिया। इसके बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। लेकिन मेरी धरती ने विदेशी शासन के सामने कभी आसानी से सिर नहीं झुकाया।
1857 की क्रांति के दौरान यहां भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की ज्वाला धधकी। सोनाखान के वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर अपने साहस और बलिदान से इतिहास में अमिट स्थान बनाया।
मेरी मिट्टी में ऐसे अनेक संघर्षों की स्मृतियां हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता की चेतना को मजबूत किया। यहां के आदिवासी आंदोलनों ने भी अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाकर स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी।
आस्था और संस्कृति की अनमोल विरासत
मेरी पहचान केवल इतिहास और वीरता तक सीमित नहीं है। मेरी सांस्कृतिक आत्मा मंदिरों, लोकपरंपराओं और धार्मिक आस्था में भी बसती है। बस्तर का दंतेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ का बम्लेश्वरी मंदिर, रतनपुर का महामाया मंदिर, सक्ती का चंद्रहासिनी मंदिर और कबीरधाम का भोरमदेव मंदिर मेरी धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।
ये मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि मेरे अतीत, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक परंपराओं के जीवंत प्रमाण भी हैं। मेरे यहां परंपराएं केवल अतीत की स्मृतियों में कैद नहीं हैं। वे आज भी जनजीवन का हिस्सा हैं और नई पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
1 नवंबर 2000: जब मुझे मिली नई पहचान
सदियों की ऐतिहासिक यात्रा के बाद 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत मेरा एक नए राज्य के रूप में गठन हुआ। रायपुर को राजधानी बनाया गया। इसके बाद नवा रायपुर (अटल नगर) को आधुनिक प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया।
राज्य बनने के साथ ही मेरी क्षेत्रीय पहचान को नई मजबूती मिली। सामाजिक और आर्थिक प्रगति के नए अवसर खुले। विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए मैंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी संजोकर रखा। आज मेरी यात्रा इस बात का प्रमाण है कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों साथ चलकर किसी क्षेत्र को नई पहचान दे सकते हैं।
खनिज संपदा से औद्योगिक शक्ति तक
मेरे पास प्रकृति का दिया हुआ अनमोल खजाना है। लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, डोलोमाइट और टिन जैसे खनिजों की प्रचुरता ने मुझे देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। भिलाई इस्पात संयंत्र ने मुझे देश के औद्योगिक मानचित्र पर विशेष पहचान दी। यह देश के प्रमुख इस्पात कारखानों में शामिल है और मेरी औद्योगिक क्षमता का बड़ा प्रतीक है।
कोरबा, रायगढ़, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जैसे जिले बिजली उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से मुझे देश के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। मेरी औद्योगिक प्रगति केवल कारखानों और बिजली संयंत्रों की कहानी नहीं है। यह उन संभावनाओं का भी परिचायक है, जो मेरे संसाधनों और सामर्थ्य में छिपी हैं।
अतीत की विरासत, भविष्य की संभावनाएं
आज मैं एक ऐसे मुकाम पर खड़ा हूं, जहां मेरा गौरवशाली अतीत और विकासशील वर्तमान एक-दूसरे से जुड़ते हैं। मेरी पहचान इतिहास, संस्कृति, प्राकृतिक संपदा और औद्योगिक प्रगति के अनूठे संगम से बनी है। मैंने पाण्डुवंश, छिंदक नागवंश और कलचुरी वंश जैसे महान राजवंशों का शासन देखा है।
मैंने मराठों का दौर देखा, अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष देखा और स्वतंत्र भारत में एक नए राज्य के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। आज मेरी धरती पर विकास की नई संभावनाएं आकार ले रही हैं। मेरी सांस्कृतिक विरासत मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रखती है, तो मेरी प्राकृतिक और औद्योगिक संपदा मुझे भविष्य की ओर बढ़ने का सामर्थ्य देती है।
मैं छत्तीसगढ़ हूं। मेरी कहानी केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि वर्तमान की उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं की कहानी भी है। मेरी असली पहचान इसी में है कि मैं अपनी विरासत को संजोते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा हूं।