

डिजिटल डेस्क, रायपुर। आजादी के 79 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। छत्तीसगढ़ के कुल 1649 सेनानियों में से आज एक भी सेनानी जीवित नहीं है, और उनके परिवारों की मौजूदा स्थिति अत्यंत दयनीय और उपेक्षापूर्ण बनी हुई है।
आज इन परिवारों की दास्तान संघर्ष, आर्थिक तंगी और सरकारी उदासीनता की बानगी बन चुकी है। आइए ऐसे ही कुछ सेनानियों के परिवारों की व्यथा को जान लेते हैं।
रायपुर के नागरदास बाबरिया मात्र 16 वर्ष की उम्र में सत्याग्रह से जुड़े थे। अंग्रेजों द्वारा जेल भेजने पर उन्होंने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर जेल की दीवार को बम से उड़ा दिया था और फरार हो गए थे। उनके बेटे मुकेश अपने पिता की एक प्रतिमा लगवाने के लिए पिछले नौ वर्षों से प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। उनका कहना है कि प्रतिमा स्थापना का सारा खर्च वे खुद उठाने को तैयार हैं, लेकिन प्रशासन केवल अनुमति देने में आनाकानी कर रहा है।
देवादा के दौलतराम साहू ने सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ग्रामीणों को संगठित कर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का नेतृत्व किया था। वर्तमान में उनका दस सदस्यों का पूरा परिवार केवल ढाई एकड़ खेती और एक छोटी सी किराना दुकान के सहारे जीवन गुजार रहा है। उनके पोते अनिल ने बताया कि दादी के निधन के बाद मिलने वाली 9,000 रुपये की पेंशन भी बंद कर दी गई है, और परिवार को नौकरी या उच्च शिक्षा में किसी प्रकार का आरक्षण नहीं मिला है।
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देवादा के ही केजऊ कोटवार ने अंग्रेजों को लगान न देने और स्वदेशी अपनाने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया था, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। उनके परपोते रविंद्र कामड़े के अनुसार, परिवार के पास कुल 2.20 एकड़ सेवाभूमि थी, जिसमें से 20 डिसमिल जमीन भारत-माला परियोजना के अंतर्गत चली गई। अब परिवार के पास केवल दो एकड़ खेती ही आजीविका का एकमात्र साधन बचा है, और घर के बुजुर्ग की सामाजिक सहायता पेंशन भी बंद कर दी गई है।
पाटन के सांतरा गांव के शिवदयाल चंद्राकर 'भारत छोड़ो आंदोलन' के एक सक्रिय सेनानी रहे थे। उनकी बहू फालगी बाई ने बताया कि उनका पूरा परिवार एक छोटे से पान ठेले के सहारे अपना गुजारा करने को मजबूर है। परिवार के सभी बेटे और बहुएं रोजगार की तलाश में रायपुर जाने को विवश हैं, और इस परिवार को आज तक किसी भी सरकारी योजना का प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिला है।
बिलासपुर के कालीचरण तिवारी ने महज 16 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था और स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के जुर्म में जेल गए थे। उनके पोते संकल्प का कहना है कि उनकी दादी को सम्मान निधि और रेल यात्रा की कुछ सुविधाएं मिलती थीं, लेकिन आज के समय में उनके वंशजों को इलाज और शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की प्राथमिकता या आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है।
वर्ष 1930 में नमक कानून तोड़ने और 1947 में क्षेत्र में पहला तिरंगा फहराने वाले पं. रामगोपाल तिवारी के पौत्र अनिल ने बताया कि उनकी दादी बृजरानी ने कभी सम्मान निधि या पेंशन लेने से इनकार कर दिया था। इस परिवार ने आज तक देश के लिए दिए गए योगदान के बदले शासन से किसी भी तरह की व्यक्तिगत सुविधा या लाभ की मांग नहीं की है।