

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। वर्षों से सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे रायपुर जिले के 1,300 से अधिक शिक्षकों के सामने अब शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करने की चुनौती है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद वर्ष 2001 से 2011 के बीच नियुक्त प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों को टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। इसके लिए 21 अगस्त 2028 तक की समय सीमा दी गई है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है, जिन्होंने सरकारी स्कूलों में 20 से 25 वर्ष तक सेवाएं दी हैं।
सेवा के अंतिम वर्षों में टीईटी की अनिवार्यता ने शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। शिक्षकों का कहना है कि नियुक्ति के समय उनके लिए टीईटी अनिवार्य नहीं थी। ऐसे में लंबे समय तक नियमित शिक्षण कार्य करने के बाद अब टीईटी उत्तीर्ण करने की शर्त लगाना उचित नहीं है। विशेषकर पदोन्नति के लिए टीईटी को अनिवार्य किए जाने का शिक्षक संगठन विरोध कर रहे हैं।
टीईटी की अनिवार्यता और पदोन्नति के मुद्दे पर विभिन्न शिक्षक संगठनों ने एकजुट होकर छत्तीसगढ़ शिक्षक संघर्ष मोर्चा का गठन किया है। शिक्षक नेता संजय शर्मा, वीरेंद्र दुबे और केदार जैन ने वर्चुअल बैठक कर मोर्चे के गठन की घोषणा की। मोर्चा शिक्षकों के हित से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलन करेगा।
मोर्चे की ओर से 16 अगस्त को सभी जिलों में विचार एवं समन्वय बैठक आयोजित की गई। इसके बाद 18 अगस्त को शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव और लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) को ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया गया है। इसमें टीईटी की अनिवार्यता के साथ ही पदोन्नति, पेंशन, वेतन विसंगति और भर्ती-पदोन्नति नियमों से जुड़े मुद्दे उठाए जाएंगे।
मोर्चे का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से वर्ष 2028 तक दी गई छूट को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों को उनकी वरिष्ठता के आधार पर रिक्त पदों पर पदोन्नति का अवसर दिया जाना चाहिए। शिक्षकों का तर्क है कि लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के लिए पदोन्नति में टीईटी की नई शर्त लागू करने से उनके हित प्रभावित होंगे।
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