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छठवीं से 12वीं तक पढ़ेंगे छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति, 100 विषयों पर तैयार होगी विशेष पाठ्य सामग्री और आर्ट रिपोजिटरी

छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों को स्थानीय कला, संस्कृति और लोकजीवन से जोड़ने के लिए विशेष पाठ्य सामग्री तैयार की जा रही है।

By Vakesh SahuEdited By: Akash Sharma
Publish Date: Tue, 25 Aug 2026 09:11:43 AM (IST)Updated Date: Tue, 25 Aug 2026 09:11:43 AM (IST)
छठवीं से 12वीं तक पढ़ेंगे छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति, 100 विषयों पर तैयार होगी विशेष पाठ्य सामग्री और आर्ट रिपोजिटरी
SCERT की 3 दिवसीय कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की संस्कृति का डिजिटल खजाना तैयार (AI Generated Image)

HighLights

  1. 24 से 26 अगस्त तक कार्यशाला आयोजित होगी
  2. लोकनृत्य, संगीत, शिल्प और पर्व भी शामिल होंगे
  3. लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट भी कार्यशाला में तैयार होगी

नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। छत्तीसगढ़ के स्कूली विद्यार्थियों को अब कक्षा छठवीं से 12वीं तक स्थानीय कला, संस्कृति, परंपराओं और लोकजीवन से जुड़े विषयों को पढ़ने का अवसर मिलेगा। स्कूल शिक्षा विभाग प्रदेश की समृद्ध कला, संस्कृति, इतिहास, धरोहर, स्थापत्य, लोक परंपराओं, गीत-संगीत, संतों, महापुरुषों और रचनाकारों को नई पीढ़ी से जोड़ने की पहल कर रहा है।

इसी उद्देश्य से राज्य शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद (SCERT), शंकर नगर में 24 से 26 अगस्त तक त्रि-दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसमें छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति पर केंद्रित आर्ट रिपोजिटरी तैयार करने के लिए प्रदेशभर के साहित्यकार, विषय-विशेषज्ञ, संस्कृतिविद, शोधकर्ता और जनसंचार विशेषज्ञ सहभागिता कर रहे हैं।


स्थानीय विरासत को पाठ्य सामग्री से जोड़ने की तैयारी

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप छत्तीसगढ़ अपने संसाधनों से पूरक पाठ्य और दृश्य सामग्री विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके माध्यम से कक्षा छठवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के साथ शिक्षक, प्रशिक्षक, शैक्षिक प्रबंधक और पालक समुदाय भी स्थानीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकेंगे।

इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों में अपनी स्थानीय धरोहरों के प्रति कलात्मक बोध, संवेदना और गौरव की भावना विकसित करना है। विभाग का प्रयास है कि प्रदेश की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को शैक्षणिक सामग्री के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

करीब 100 विषयों पर तैयार होगी सामग्री

कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सभ्यता और कला से संबंधित करीब 100 विषयों पर लेखन और मार्गदर्शन किया जा रहा है। विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे प्रतिष्ठित साहित्यकार, विषय-विशेषज्ञ, संस्कृतिविद, शोधकर्ता और जनसंचार विशेषज्ञ इन विषयों पर सामग्री तैयार कर रहे हैं। विषयों को प्रमुख विधाओं के अनुसार बांटकर अलग-अलग समूह बनाए गए हैं।

संतों और महापुरुषों को भी मिलेगा स्थान

आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ से जुड़ी विभूतियों, संतों और महापुरुषों के योगदान को भी शामिल किया जा रहा है। इसमें लोमश ऋषि, वाल्मीकि, वल्लभाचार्य, गुरु घासीदास, नागार्जुन, श्रृंगी ऋषि, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, पद्मश्री तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, तुलसीराम देवांगन, सुरुज बाई खांडे, माधवराव सप्रे, दाऊ कल्याण सिंह, मिनीमाता, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय, झाडूराम देवांगन, पं. सुंदरलाल शर्मा, धनी धर्मदास, शहीद वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर सहित अनेक विभूतियों को स्थान दिया जा रहा है।

स्थापत्य और तीर्थ स्थलों की जानकारी भी

सामग्री में छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला और प्रमुख तीर्थ स्थलों को भी शामिल किया गया है। इनमें कौशल्या मंदिर, सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजीव लोचन मंदिर राजिम जैसे महत्वपूर्ण स्थल शामिल हैं।

पंथ और परंपराओं के तहत सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मामा-भांजा, मितान-बदना, लमसेना और मानस मंडली जैसी विशिष्ट परंपराओं पर भी सामग्री तैयार की जा रही है।

पर्व, शिल्प और लोकसंगीत भी पाठ्य सामग्री में

छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्व और उत्सवों को भी सामग्री का हिस्सा बनाया गया है। हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा पर्व, गौरी-गौरा, रथयात्रा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई के साथ पारंपरिक खेल एवं गतिविधियों को शामिल किया गया है।

दृश्य कला और शिल्प में डोकरा आर्ट, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्रों को जगह दी जा रही है। लोक संगीत एवं वाद्ययंत्रों में कबीर गायन, सुआ, बांस, डंडा, पंथी, भोजली, देवार, ददरिया, फाग, भरथरी, विवाह और चंदैनी गीत शामिल हैं। मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्यों पर भी सामग्री तैयार होगी।

लोक नृत्य और रंगमंच की विधाओं में पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुआ, सरहुल नृत्य, नाचा, पंडवानी और लोककथाओं को शामिल किया गया है।

पारंपरिक व्यंजनों की भी होगी जानकारी

विद्यार्थियों को छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पाक कला से परिचित कराने की भी योजना है। इसके तहत ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे पारंपरिक व्यंजनों पर सामग्री तैयार की जाएगी।

तीन दिनों में सामग्री से पटकथा तक काम

कार्यशाला के पहले दिन पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण, विषयवार समीक्षा और समूह गठन किया जा रहा है। दूसरे दिन 25 अगस्त को सामग्री के संशोधन और परिमार्जन के साथ अंतिम ड्राफ्ट तय किया जाएगा। इसी दिन लघु फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी होगा।

तीसरे दिन 26 अगस्त को लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट का प्रस्तुतीकरण, अंतिम संपादन और स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इसके बाद समापन सत्र आयोजित किया जाएगा।