
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंजीनियरिंग में करियर सिर्फ आईटी और कम्प्यूटर पर ही केंद्रित हो गया है। छात्र इन्हीं ब्रांच में प्रवेश लेना चाहते हैं। स्थिति यह है कि अनुदान प्राप्त व सरकारी कॉलेजों में इन ब्रांच की सीमित सीटें है। जबकि प्राइवेट कालेजों ने ब्रांचों की सीटें बढ़ाई है। कई निजी कॉलेजों ने परंपरागत ब्रांच सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स भी बंद कर दी या सीटें कम कर दी। यही वजह है कि पिछले 10 वर्षो में इंजीनियर के कोर्सेस की डिमांड कम हुई और छात्र प्रवेश कम ले रहे है।
यह कहना है एसजीएआईटीएस के इंस्टीट्यूट प्लानिंग फाइनेंस व एडमिनिस्ट्रेशन डीन डॉ. संदीप नारुलकर का। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने हर राज्य में आईआईटी, एनआईटी और काफी संख्या में इंडियन इंस्टि्युट आफ इंफार्मेस टेक्नोलॉजी जैसे संस्थान भी बड़े पैमाने पर खोल दिए है। इस वजह से अधिकांश छात्र इन संस्थानों में प्रवेश लेते है और राज्य स्तर के इंजीनियर महाविद्यालयों में कम सीटें ही भर पा रही है। मप्र से बाहर की कई प्रायवेट यूनिवर्सिटी ने अपने कालेज प्रदेश में खोले है। इसके अलावा मप्र के कई अच्छे प्रायवेट कालेज भी विश्वविद्यालय में तब्दील हो गए। इन कालेजों के पास कम्प्यूटर व इंफार्मेशन टेक्नोलाजी की काफी सीटें उपलब्ध है। इस वजह से छात्र आइआइटी, एनआइटी, आइआइआइटी जैसे संस्थानों के बाद निजी विश्विद्यालयों के इंजीनियर कालेजों में प्रवेश होते है।
20 साल पहले तक मप्र में तेजी से निजी इंजीनियर कालेज खुले थे। उस समय प्रदेश में 200 से अधिक इंजीनियर कालेज हो गए है। इनमें से अब कई कई कालेज बंद होने की कगार पर है तो कुछ बंद भी हो गए है। छात्रों की संख्या कम होने के कारण कालेज चलाने के खर्चो का वहन भी संस्थान नहीं कर पा रहे है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षो में हर साल पांच से दस इंजीनियर कालेज बंद हो रहे है।
अभी कामर्स व मैनेजमेंट कोर्स की ओर छात्रो का रुझान बढ़ा है। यही वजह है कि कई छात्र इंजीनियर के बजाए बीबीए, एमबीए, बीकाम,एमकाम, सीए व सीएस जैसे कोर्सेस को करना पसंद कर रहे है। यह भी वजह है कि अभी इंजीनियर कालेजों में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या कम हुई है। यही वजह है कि जो प्रायवेट इंजीनियर कालेज अपनी सीटें नहीं भर पा रहे है। उन्होंने फीस विनियामक आयोग से फीस कटौती की मांग की है।
वो चाहते है कि यदि फीस कम करेंग तो कम फीस में ज्यादा प्रवेश कर सकते है। इंजीनियर कालेजों में छात्रों की संख्या कम होने के कारण संस्थान उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षकों की नियुक्ति भी नहीं कर पा रहे है। वर्तमान इंजीनियर में पढ़ाने के बजाए युवा नौकरी कर ज्यादा कमाना पसंद करते है। इस वजह से शिक्षकों का टोटा हुआ है। छात्र संख्या कम होने के कारण संस्थाने शिक्षक को उनकी मांग के मुताबिक वेतन भी नहीं दे पा रहे है। यही वजह है कि अभी के दौर में इंजीनियरिंग कालेजों का भविष्य संकट में नजर आ रहा है।