
लाइफस्टाइल डेस्क। आज सिरदर्द हो, वजन घटाना हो या चेहरे पर मुंहासे निकल आएं- कई युवा डॉक्टर से सलाह लेने से पहले मोबाइल उठाते हैं। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर उन्हें कुछ ही सेकंड में घरेलू नुस्खे, डाइट प्लान और बीमारी के लक्षणों से जुड़ी जानकारी मिल जाती है।
लेकिन क्या सोशल मीडिया पर दिखने वाली हर हेल्थ टिप भरोसेमंद होती है? किसी वीडियो पर लाखों व्यूज और कमेंट्स देखकर क्या उसे सही मान लेना चाहिए? युवाओं की ऑनलाइन हेल्थ से जुड़ी आदतों पर हुई रिसर्च इन सवालों को महत्वपूर्ण बनाती है।
Discover Public Health जर्नल में 17 अप्रैल 2026 को प्रकाशित एक रिसर्च में वाराणसी के एक अस्पताल में आए 16 से 24 साल के 196 युवाओं को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने उनके ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी खोजने और उसकी विश्वसनीयता जांचने की आदतों का रिसर्च किया।
रिसर्च में सामने आया कि 87.8% युवाओं ने ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी खोजने की बात कही। वहीं, 68.9% ने जानकारी के सोर्स की जांच नहीं की और केवल 5.1% ने उसकी विश्वसनीयता सक्रिय रूप से जांची। इसके अलावा, 45.9% युवाओं ने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए हिंदी को प्राथमिकता दी।
ये आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट युवाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का अहम माध्यम बन चुका है। हालांकि, यह रिसर्च केवल एक अस्पताल में आए युवाओं पर आधारित था, इसलिए इसके नतीजों को पूरे भारत की Gen Z पर लागू नहीं किया जा सकता।
सोशल मीडिया पर हेल्थ कंटेंट अक्सर आसान भाषा, आकर्षक विजुअल और छोटे उदाहरणों के साथ पेश किया जाता है। इससे जटिल मेडिकल जानकारी भी आसानी से समझ आने वाली लगती है।
उदाहरण के लिए, कोई क्रिएटर दावा करता है कि सुबह खाली पेट एक खास ड्रिंक पीने से तेजी से वजन घटेगा या कोई सप्लीमेंट मुंहासे खत्म कर देगा। वीडियो में पहले और बाद की तस्वीरें और सकारात्मक कमेंट्स देखकर सलाह सही लग सकती है।
लेकिन ज्यादा व्यूज, लाइक्स और फॉलोअर्स किसी स्वास्थ्य संबंधी दावे के वैज्ञानिक रूप से सही होने का प्रमाण नहीं हैं। किसी व्यक्ति का निजी अनुभव भी हर किसी के लिए कारगर इलाज का सबूत नहीं होता।
2023 में Academic Pediatrics जर्नल में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में किशोरों के सोशल मीडिया पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पर भरोसा करने से जुड़े रिसर्चों का विश्लेषण किया गया। इसमें सामने आया कि युवा जानकारी की विश्वसनीयता परखने के लिए उसके सोर्स, प्रस्तुति और अपने भरोसे जैसे संकेतों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में जानकारी आकर्षक होने पर उसके सही होने का आभास भी पैदा हो सकता है।
डिजिटल हेल्थ लिटरेसी का मतलब केवल इंटरनेट पर बीमारी के लक्षण सर्च करना नहीं है। इसमें जानकारी को समझना, उसके सोर्स की जांच करना और यह पहचानना भी शामिल है कि कौन-सी सलाह भरोसेमंद है।
2025 में SSM- Population Health जर्नल में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय रिसर्च में भारत, अमेरिका और जापान के 1,500 विश्वविद्यालयी छात्रों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि डिजिटल जानकारी का इस्तेमाल करने की क्षमता और उसकी आलोचनात्मक जांच करने की क्षमता अलग-अलग हो सकती हैं।
यानी मोबाइल और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने में माहिर होना इस बात की गारंटी नहीं है कि कोई व्यक्ति ऑनलाइन मेडिकल जानकारी की सच्चाई भी आसानी से पहचान लेगा।
हर ऑनलाइन हेल्थ टिप गलत नहीं होती। सोशल मीडिया पर डॉक्टर और स्वास्थ्य संस्थान भी उपयोगी जानकारी साझा करते हैं। परेशानी तब होती है, जब बिना प्रमाण वाले दावों को इलाज की तरह पेश किया जाता है।
ऐसी सलाह के कारण लोग डॉक्टर से मिलने में देरी कर सकते हैं, बिना जरूरत सप्लीमेंट खरीद सकते हैं या अपनी दवा बंद करने जैसा जोखिम भरा फैसला ले सकते हैं। वजन घटाने, त्वचा की देखभाल, हार्मोन और पीरियड्स जैसे विषयों पर गलत जानकारी भ्रम पैदा कर सकती है।
2024 में National Medical Journal of India में प्रकाशित एक रिसर्च में पश्चिम बंगाल के अस्पताल में आए 673 वयस्कों को शामिल किया गया। इनमें 70.4% प्रतिभागियों ने बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया संदेशों के आधार पर स्वास्थ्य संबंधी फैसले लिए थे। वहीं, 44.7% ने कहा कि वे फैसला लेने से पहले स्वास्थ्य पेशेवरों से संदेशों की प्रामाणिकता जांचते थे। यह रिसर्च Gen Z पर केंद्रित नहीं था, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी फैसलों में सोशल मीडिया की भूमिका को समझने में मदद करता है।
ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी सलाह अपनाने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
सोशल मीडिया स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाने का उपयोगी माध्यम हो सकता है, लेकिन यह डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। Gen Z के सामने चुनौती सिर्फ सही जानकारी ढूंढने की नहीं, बल्कि आकर्षक दावों और वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच अंतर पहचानने की भी है।