
आकृति, नईदुनिया, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश का पन्ना देश में हीरों के लिए सबसे ज्यादा चर्चित इलाकों में से एक है। यहां खेतों, निजी जमीन और सरकारी जमीन के कुछ हिस्सों में छोटे स्तर पर हीरों की तलाश के लिए पट्टे दिए जाते हैं। खुदाई के दौरान अगर किसी व्यक्ति को हीरा मिल जाता है तो वह उसे अपने पास रखकर सीधे बाजार में नहीं बेच सकता। उसे हीरा पन्ना के हीरा कार्यालय में जमा करना होता है।
वहां पत्थर की जांच करने के बाद उसे नीलामी में रखा जाता है। इसमें मिलने वाली रकम में से सरकार की रॉयल्टी काटे जाने के बाद बाकी राशि पट्टेदार को दी जाती है।
लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पन्ना में हीरा मिलने पर क्या करना होता है। सवाल यह भी है कि भारत में आखिर और कहां हीरे मिल सकते हैं, हीरे की कीमत और प्योरिटी कैसे तय होती है, हीरे का कैरेट और सोने का कैरेट अलग कैसे है और क्या कोई व्यक्ति अपनी जमीन या खेत में अपने अनुसार खुदाई करके हीरा खोज सकता है? इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे इस एक्सप्लेनर में…
पन्ना की खदानों में अब तक का सबसे महंगा और बड़ा आधिकारिक रूप से नीलाम हुआ हीरा 2010 में मिला था। इसे NMDC पन्ना खदान से निकाला गया। यह हीरा 34.37 कैरेट का जेम-क्वालिटी हीरा था, जो लगभग 3.2 करोड़ में नीलाम हुआ था। वहीं हाल ही में सितंबर 2026 में इसी NMDC मझगवां खदान से 27.29 कैरेट का एक और नायाब हीरा मिला है, जिसकी कीमत करीब 1.5 से 2.5 करोड़ के बीच हो सकती है।
Indian Minerals Yearbook के मुताबिक, भारत में डायमंड फील्ड को मोटे तौर पर चार क्षेत्रों में बांटा गया है।
इसके अलावा देश में अलग-अलग समय पर हीरे वाली चट्टानों यानी किम्बरलाइट और लैम्प्रोइट की तलाश भी हुई है। सरकारी रिकॉर्ड में कर्नाटक, झारखंड और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में ऐसी खोज का उल्लेख मिलता है। इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी जगहों पर आज व्यावसायिक स्तर पर हीरे निकाले जा रहे हैं। यह सिर्फ प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्लूरो के मुताबिक बताया गया है।
राष्ट्रीय खनिज सूची के 1 अप्रैल 2020 के आंकड़ों के आधार पर भारत में करीब 31.72 मिलियन कैरेट के डायमंड रिजर्व और रिसोर्स थे। इनमें लगभग 90.14 % संसाधन मध्य प्रदेश, 5.74 % आंध्र प्रदेश और 4.12 % छत्तीसगढ़ में दर्ज किए गए थे। हालांकि इन आंकड़ों में रिजर्व, शेष संसाधन और अलग-अलग ग्रेड शामिल हैं। इसलिए इसे सीधे बाजार में उपलब्ध हीरों की मात्रा नहीं माना जा सकता।
यहां सबसे जरूरी बात जमीन की है। किसी व्यक्ति के पास जमीन होने का मतलब यह नहीं है कि वह उस जमीन के नीचे मौजूद मिनरल को अपनी मर्जी से निकाल सकता है। भारत में माइनिंग एक्टिविटी को मुख्य रूप से Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 यानी MMDR Act से जुड़े नियम नियंत्रित करते हैं। कानून के तहत मिनरल्स की खोज के लिए संबंधित अनुमति, लाइसेंस या माइनिंग लीज की जरूरत होती है।
पन्ना में छोटे स्तर पर हीरे की माइनिंग के लिए अलग व्यवस्था रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 2014 के रिकॉर्ड में मध्य प्रदेश सरकार की ओर से बताया गया था कि निजी व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली ऐसी शैलो डायमंड माइनिंग निजी या राजस्व भूमि तक सीमित है। वन भूमि में इसकी अनुमति नहीं है। इसके लिए 8 मीटर × 8 मीटर के प्लॉट के पट्टे की व्यवस्था बताई गई थी।
यानी किसान की जमीन है तो भी वह सिर्फ जमीन का मालिक होने के आधार पर हीरे की खदान नहीं चला सकता। उसे संबंधित सरकारी व्यवस्था के तहत अनुमति या पट्टा लेना होगा।
पन्ना की शैलो डायमंड माइनिंग के लिए उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में ऐसा कोई एक आंकड़ा नहीं मिलता कि हर पट्टेदार को ठीक इतने फीट तक खुदाई करने की अनुमति है। यानी यह कहना सही नहीं होगा कि पन्ना में हर व्यक्ति 25 से 30 फीट (लगभग 8 से 10 मीटर) तक कानूनी रूप से खुदाई कर सकता है।
पुराने सरकारी दस्तावेजों में शैलो माइनिंग के दौरान 20 मीटर तक गहरे गड्ढे देखे जाने की बात सामने आई है। लेकिन ये आंकड़े किसी सामान्य कानूनी अधिकतम गहराई की सीमा नहीं हैं।
पन्ना में हीरे की मौजूदगी का एक खास पहलू यह है कि डायमंड-बेयरिंग क्षेत्र सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं हैं। कुछ जगहों पर निजी और राजस्व भूमि भी इन क्षेत्रों में आती है।
लेकिन जमीन का इस्तेमाल किस काम के लिए होगा, यह पट्टे और संबंधित सरकारी अनुमति पर निर्भर करता है। खेती के लिए इस्तेमाल हो रही जमीन पर व्यक्ति सिर्फ इसलिए खनन शुरू नहीं कर सकता क्योंकि वह उसका मालिक है।
अगर किसी जमीन पर हीरे की शैलो माइनिंग के लिए सरकारी पट्टा लिया गया है तो खुदाई उसी तय क्षेत्र और शर्तों के अनुसार करनी होगी।
नेशनल ग्रीन ट्रिबीयूनल (NGT) के रिकॉर्ड में साफ दर्ज है कि निजी व्यक्तियों की शैलो डायमंड माइनिंग को वन भूमि से अलग रखा गया था। दूसरी ओर पन्ना की बड़ी माइनिंग प्रोजेक्ट में वन भूमि शामिल होने पर अलग से Forest Clearance और Environmental Clearance जैसी मंजूरियों की जरूरत पड़ती है।
इसलिए जंगल में जाकर जमीन खोदना और खेत या राजस्व भूमि पर वैध पट्टे के तहत शैलो माइनिंग करना दो अलग बातें हैं।
हीरे का कैरेट उसकी शुद्धता नहीं बताता। हीरे में कैरेट मुख्य रूप से उसके वजन की इकाई है। एक कैरेट यानी 200 मिलीग्राम या 0.20 ग्राम। एक कैरेट को 100 पॉइंट में बांटा जा सकता है। उदाहरण के लिए 0.50 कैरेट का हीरा 50 पॉइंट का कहलाता है।
आसानी से समझे-
1 कैरेट- 200 मिलीग्राम यानी 0.20 ग्राम
1 कैरेट- 100 पॉइंट
इसलिए अगर किसी खबर में लिखा है कि किसी व्यक्ति को 5 कैरेट का हीरा मिला, तो इसका मतलब यह है कि उसका वजन 1 ग्राम है। लेकिन सिर्फ 5 कैरेट होने से यह तय नहीं होता कि हीरा कितने रुपए का है।
हीरे की गुणवत्ता और कीमत समझने के लिए दुनिया भर में 4Cs का इस्तेमाल किया जाता है-
इन चारों चीजों को मिलाकर हीरे की गुणवत्ता और बाजार मूल्य का आकलन किया जाता है। दो हीरे अगर एक ही वजन यानी समान कैरेट के हों, तब भी उनके रंग, क्लैरिटी और कट अलग होने की वजह से उनकी कीमत में बड़ा अंतर हो सकता है।
यही वजह है कि पन्ना में मिले किसी कच्चे हीरे की शुरुआती पहचान में सिर्फ उसका वजन पर्याप्त नहीं होता। पत्थर की प्रकृति, रंग, क्लैरिटी और दूसरी विशेषताओं को देखकर उसकी गुणवत्ता और नीलामी में संभावित कीमत तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
यहीं पर सबसे ज्यादा कंफ्यूज करने वाली चीज होती है-
Diamond में Carat = वजन
जबकि
Gold में Karat/Carat = शुद्धता
हीरे का 1 कैरेट यानी 200 मिलीग्राम वजन होता है। वहीं सोने में 24 कैरेट का मतलब लगभग शुद्ध सोना होता है। 22 कैरेट सोने में करीब 91.6 % सोना होता है, जबकि 18 कैरेट में 75 % सोना होता है।
भारत में BIS के मानकों के मुताबिक सोने की शुद्धता को कैरेट के साथ-साथ फाइननेस यानी प्रति हजार हिस्सों में भी बताया जाता है। उदाहरण के लिए 22K सोने की फाइननेस 916 और 18K की 750 होती है।
यानी आसान भाषा में-
हीरा 2 कैरेट = वजन 0.40 ग्राम
लेकिन
सोना 22 कैरेट = सोने की शुद्धता करीब 91.6 %
दोनों जगह शब्द लगभग एक जैसा सुनाई देता है, लेकिन उसका मतलब अलग है।
पन्ना क्षेत्र में मिलने वाले हीरों में रंग और गुणवत्ता में अंतर हो सकता है। इंडियन ब्लूरो ऑफ मीइन्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के डायमंड संसाधनों में जेम क्वालिटी के अलावा इंडस्ट्रियल और अनक्लासिफाइड श्रेणी के संसाधन भी शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज संसाधनों का बड़ा हिस्सा उस समय ‘Unclassified’ श्रेणी में था।
इसका मतलब यह है कि जमीन से निकला हर चमकीला पत्थर करोड़ों का रत्न नहीं होता। पहले यह तय करना जरूरी है कि वह वास्तव में प्राकृतिक हीरा है या नहीं। फिर उसकी गुणवत्ता और उपयोग की श्रेणी निर्धारित होती है।
पन्ना की शैलो डायमंड माइनिंग से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड और देश के खनन कानूनों को एक साथ देखें तो कुछ बातें स्पष्ट होती हैं-
यानी पन्ना की हिस्ट्री तो इंटरेस्टिंग है ही लेकिन उससे भी ज्यादा इंटरेस्टिंग इसके बारे में जानना और पढ़ना है। पन्ना की धरती भले ही हीरों का खजाना हो, लेकिन यह किसी को रातों-रात अमीर बनाने का कोई आसान जादू नहीं है। हीरा ढूंढने से लेकर उसे बाजार तक पहुंचाने के हर कदम पर कड़े सरकारी नियम लागू होते हैं।