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MP Tourist Places: विराट जलप्रपात और संगमरमर की घाटियां, जबलपुर में कहां जाएं, क्‍या देखें, यहां है संपूर्ण टूर गाइड

MP Tourist Places: अगर जबलपुर को पर्यटन की नजर से देखना हो तो दो दिन पर्याप्त शुरुआत हो सकते हैं। जबलपुर की सबसे बड़ी खूबी उसके पर्यटन स्थलों से भी आग...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Wed, 26 Aug 2026 12:17:59 PM (IST)Updated Date: Wed, 26 Aug 2026 12:52:34 PM (IST)
MP Tourist Places: विराट जलप्रपात और संगमरमर की घाटियां, जबलपुर में कहां जाएं, क्‍या देखें, यहां है संपूर्ण टूर गाइड
जबलपुर : नर्मदा की धारा में बहता एक पूरा पर्यटन संसार

HighLights

  1. भेड़ाघाट की संगमरमर की घाटियों से धुआंधार की गर्जना तक।
  2. इतिहास की पहाड़ियों से नर्मदा आरती की पवित्र रोशनी तक।
  3. जबलपुर में कहां जाएं, क्या देखें, शहर को कैसे महसूस करें।

सुरेन्द्र दुबे, जबलपुर। सुबह का सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं है। गौरीघाट की सीढ़ियों पर हलचल शुरू हो चुकी है। कोई नर्मदा में आस्था की डुबकी लगा रहा है, कोई हाथ जोड़कर शांत जलधारा को देख रहा है और कुछ लोग किनारे बैठकर दिन की शुरुआत को महसूस कर रहे हैं।

कुछ किलोमीटर आगे यही नर्मदा अपना रूप बदल लेती है। भेड़ाघाट पहुंचते ही नदी संगमरमर की ऊंची चट्टानों के बीच सिमट जाती है। नाव आगे बढ़ती है तो दोनों ओर सफेद, धूसर और अलग-अलग आकृतियों वाली चट्टानें दिखाई देती हैं। पानी पर पड़ती रोशनी के साथ दृश्य लगातार बदलता रहता है।


और फिर इसी यात्रा का अगला पड़ाव धुआंधार है, जहां शांत दिखाई देने वाली नर्मदा अचानक गर्जना करती हुई चट्टानों से नीचे गिरती है। यही जबलपुर है। एक ऐसा शहर जहां कुछ ही घंटों में नदी, पहाड़, जंगल, इतिहास, अध्यात्म और आधुनिक जीवनशैली, सबका अनुभव किया जा सकता है।

नर्मदा के साथ शुरू होती है जबलपुर की यात्रा। जबलपुर को समझना हो तो नर्मदा से शुरुआत करनी होगी। यहां नर्मदा केवल नदी नहीं है। शहर के धार्मिक जीवन, पर्यटन और लोक-संस्कृति से उसका गहरा रिश्ता है। गौरीघाट की सुबह हो या शाम की महाआरती, नदी के किनारे का जीवन शहर की अपनी गति से चलता दिखाई देता है।

सूर्योदय के समय घाटों पर शांति होती है तो शाम होते-होते वही जगह दीपों, घंटियों और आरती की रोशनी से भर जाती है। पर्यटक के लिए यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जबलपुर की जीवनशैली को करीब से देखने का अवसर भी है।

जबलपुर में क्या देखें?

  • नर्मदा और गौरीघाट
  • भेड़ाघाट और संगमरमर की चट्टानें
  • धुआंधार जलप्रपात
  • चौसठ योगिनी मंदिर
  • मदन महल
  • डुमना नेचर रिजर्व
  • बरगी जलाशय
  • तिलवारा और नर्मदा के अन्य घाट
  • शहर के पुराने बाजार
  • साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन

भेड़ाघाट : जहां नदी संगमरमर के बीच से गुजरती है

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गौरीघाट से आगे बढ़ते हुए जब भेड़ाघाट पहुंचते हैं तो जबलपुर का प्राकृतिक चेहरा सामने आता है। संगमरमर की ऊंची चट्टानों के बीच से गुजरती नर्मदा और उसके ऊपर चलती नाव-यह दृश्य जबलपुर की सबसे अलग पहचान में शामिल है। चट्टानों की आकृतियां हर मोड़ पर बदलती हैं। दिन के अलग-अलग समय में रोशनी का प्रभाव भी दृश्य को नया रूप देता है। चांदनी रात में भेड़ाघाट का अनुभव और अलग होता है। संगमरमर पर पड़ती चांदनी और उसके बीच बहती नर्मदा इसे पर्यटन स्थल से आगे एक प्राकृतिक अनुभव बना देती है।

धुआंधार : जहां नर्मदा की आवाज सुनाई देती है

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भेड़ाघाट से आगे बढ़ते ही नर्मदा का स्वर बदल जाता है। धुआंधार में नदी ऊंचाई से नीचे गिरती है। पानी के गिरने से उठती फुहार दूर से धुएं जैसी दिखाई देती है और इसी से इसे धुआंधार नाम मिला। मानसून में नदी का प्रवाह बढ़ने के साथ इसका दृश्य और प्रभावशाली हो जाता है। लेकिन यहां मौसम के साथ सावधानी भी जरूरी है। बारिश के दिनों में पानी का बहाव तेज हो सकता है और चट्टानें फिसलन भरी हो जाती हैं। इसलिए निर्धारित सुरक्षित क्षेत्र से बाहर जाकर सेल्फी या फोटो लेना जोखिम भरा हो सकता है।

चौसठ योगिनी : प्रकृति के बीच इतिहास और आस्था

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भेड़ाघाट के आसपास की यात्रा केवल नदी और झरने तक सीमित नहीं है। ऊंचाई पर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर इतिहास, स्थापत्य और अध्यात्म का महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां पहुंचने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद आसपास का प्राकृतिक विस्तार यात्रा की थकान कम कर देता है। एक ओर मंदिर की प्राचीन संरचना और दूसरी ओर दूर तक दिखाई देती नर्मदा की घाटी-यहां इतिहास और प्रकृति एक ही फ्रेम में दिखाई देते हैं।

मदन महल : पहाड़ी पर खड़ा इतिहास

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जबलपुर की यात्रा में मदन महल को शामिल किए बिना शहर की ऐतिहासिक पहचान अधूरी रह जाती है। पहाड़ी पर स्थित यह ऐतिहासिक संरचना गोंड इतिहास की याद दिलाती है। यहां पहुंचकर शहर को ऊंचाई से देखने का अनुभव भी मिलता है। जबलपुर का यह हिस्सा बताता है कि शहर की पहचान केवल नर्मदा और प्राकृतिक पर्यटन से नहीं बनी। इसके पीछे एक लंबी ऐतिहासिक यात्रा भी है।

डुमना और बरगी : शहर से थोड़ी दूर, प्रकृति के ज्यादा करीब

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अगर सप्ताहांत में भीड़ से दूर जाना हो तो डुमना नेचर रिजर्व एक विकल्प है। हरियाली, जलाशय और प्राकृतिक वातावरण शहर की रफ्तार से कुछ समय के लिए अलग कर देते हैं। दूसरी ओर बरगी का विस्तृत जलाशय खुले आसमान और पानी के लंबे विस्तार के साथ अलग तरह का अनुभव देता है। यहां जबलपुर की लाइस्टाइल का एक दूसरा चेहरा दिखाई देता है-ऐसी जीवनशैली जिसमें वीकेंड का मतलब केवल माल, कैफे या रेस्टोरेंट नहीं, बल्कि जंगल, नदी, पहाड़ी और खुला आसमान भी है।

मंदिरों और घाटों का अपना संसार

जबलपुर के पर्यटन मानचित्र पर नर्मदा से जुड़े घाटों की अपनी अलग पहचान है। गौरीघाट, तिलवारा और भेड़ाघाट जैसे क्षेत्र धार्मिक आस्था के साथ शहर की सामाजिक गतिविधियों के भी केंद्र हैं। त्योहारों के दौरान घाटों का स्वरूप बदल जाता है। आरती, पूजा, धार्मिक आयोजन और स्थानीय मेल-जोल इन स्थानों को केवल पर्यटन स्थल नहीं रहने देते। यहां आने वाला पर्यटक शहर को केवल देखता नहीं, बल्कि उसके दैनिक जीवन का हिस्सा बनकर कुछ समय महसूस कर सकता है।

संस्कारधानी की पहचान साहित्य से भी

  • जबलपुर को संस्कारधानी कहा जाता है तो उसके पीछे केवल धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि साहित्य और बौद्धिक चेतना भी है।
  • हरिशंकर परसाई की व्यंग्य परंपरा जबलपुर की साहित्यिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शहर में साहित्यिक आयोजन, रंगमंच, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियां आज भी इसकी सामाजिक ऊर्जा को बनाए हुए हैं।
  • यही वह पक्ष है जो जबलपुर को केवल पर्यटन शहर बनने से रोकता है।
  • यहां आने वाला व्यक्ति प्रकृति देखने के साथ एक ऐसी नगरी से भी परिचित होता है जिसकी अपनी साहित्यिक स्मृति और सांस्कृतिक आवाज है।

बाजार में मिलता है असली जबलपुर

किसी शहर को जानना हो तो उसके बाजार में जाइए। पुराने जबलपुर के बाजारों में आज भी पारंपरिक जीवनशैली की झलक मिलती है। वहीं नई पीढ़ी के कैफे, रेस्टोरेंट, शापिंग सेंटर और आधुनिक बाजार शहर के बदलते स्वरूप को सामने रखते हैं। सुबह का पोहा-जलेबी, चाय की दुकान पर स्थानीय बातचीत, नमकीन-मिठाइयों की दुकानें और शाम की बाजार की चहल-पहल-ये छोटे दृश्य जबलपुर की बड़ी तस्वीर बनाते हैं। यहां का भोजन केवल स्वाद नहीं, सामाजिक जीवन का हिस्सा है।

पुराना शहर और नई लाइफस्टाइल

जबलपुर की खासियत उसका पुराना और नया रूप एक साथ होना है। पुरानी गलियां, मंदिर, बाजार और पारंपरिक मोहल्ले आज भी मौजूद हैं। साथ ही नए आवासीय क्षेत्र, शिक्षण संस्थान, अस्पताल, व्यावसायिक केंद्र और आधुनिक सुविधाएं शहर का विस्तार कर रही हैं। युवा पीढ़ी तकनीक, आईटी, डिजिटल मीडिया, नए व्यवसाय और वैश्विक अवसरों से जुड़ रही है। लेकिन त्योहार, परिवार और स्थानीय परंपराएं भी उसके जीवन में बनी हुई हैं। यही संतुलन जबलपुर को उसकी अपनी गति देता है।

एक वीकेंड, कई अनुभव

अगर जबलपुर को पर्यटन की नजर से देखना हो तो दो दिन पर्याप्त शुरुआत हो सकते हैं।

पहला दिन: सुबह गौरीघाट, फिर भेड़ाघाट, चौसठ योगिनी और धुआंधार।

दूसरा दिन: मदन महल, डुमना या बरगी की ओर यात्रा और शाम को फिर नर्मदा किनारे लौटना।

लेकिन जबलपुर को केवल दो दिन में समझ लेना संभव नहीं। इसके लिए शहर की गलियों में थोड़ा भटकना होगा। किसी स्थानीय व्यक्ति से बात करनी होगी। किसी घाट पर कुछ देर बिना कैमरा निकाले बैठना होगा। तभी समझ आएगा कि पर्यटन यहां केवल दर्शनीय स्थलों की सूची नहीं है।

जबलपुर की असली खूबी

  • जबलपुर अपने सौंदर्य का शोर नहीं करता।
  • वह धीरे-धीरे सामने आता है।
  • पहली बार आएंगे तो भेड़ाघाट दिखाई देगा।
  • दूसरी बार नर्मदा महसूस होगी।
  • तीसरी बार शहर का इतिहास और संस्कृति समझ आएगी।

और जब कुछ समय यहां रहेंगे तो पता चलेगा कि जबलपुर की सबसे बड़ी खूबी उसके पर्यटन स्थलों से भी आगे है। यहां प्रकृति विराट है, लेकिन जीवन सहज है। इतिहास गौरवशाली है, लेकिन व्यवहार आत्मीय है। आधुनिकता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन परंपरा अभी साथ चल रही है।

और क्या लेकर लौटें?

जबलपुर से लौटते समय कैमरे में भेड़ाघाट की तस्वीरें होंगी, धुआंधार की आवाज याद होगी, नर्मदा आरती की रोशनी आंखों में होगी और शायद किसी चाय की दुकान पर हुई अनजान व्यक्ति से बातचीत भी स्मृति में रह जाएगी।

यही जबलपुर की खूबसूरती है।

यहां पर्यटन सिर्फ जगहों को देखने का नाम नहीं। यहां पर्यटन शहर के स्वभाव को महसूस करने का नाम है।

नर्मदा यहां जीवन देती है।

प्रकृति मन रोकती है।

इतिहास सिर ऊंचा करता है।

संस्कृति भीतर उतरती है।

और लोग-बिना किसी औपचारिकता के-दिल में जगह बना लेते हैं।

इसलिए जबलपुर को सिर्फ देखा नहीं जाता।

जबलपुर को जिया जाता है।