
नईदुनिया प्रतिनिधि, सिवनी। मधुमेह को अक्सर मरीज नजर अंदाज कर देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे यह बीमारी आगे बढ़ती है, यह शरीर में कई जटिलताएं पैदा करती है। इसलिए इसे धीमे जहर (स्लो पाइजन) की संज्ञा दी गई है क्योंकि यह धीरे-धीरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को खराब करता है।
यह जानकारी नईदुनिया के 'हेलो डाॅक्टर' कार्यक्रम में मधुमेह रोग विशेषज्ञ और शिवहरे क्लीनिक के संचालक डाॅ. शुभम शिवहरे (एमबीबीएस एफसीपीएस मेडिसिन मुंबई) ने पाठकों के मधुमेह रोग से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देते हुए दी।
बीमारी से बचाव व नियंत्रण पर परामर्श देते हुए शिवहरे ने बताया कि खुद को बिल्कुल ठीक मानते हुए अक्सर लोग दवाइयों को डोज शुरू करने से बचते हैं लेकिन यह ठीक नहीं है।
इलाज में देरी से यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा देता है। इसलिए सही समय उपचार इसका उपचार और नियंत्रण जरूरी है।
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मधुमेह की बीमारी का लक्षण क्या है, इसे किस तरह पहचाना जा सकता है?
राजकुमार धुर्वे, सिवनी
साधारण शब्दों में मधुमेह का मतलब है शरीर में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाना और इंसुलिन का स्तर कम होना या इंसुलिन का प्रभावी ढंग से काम न करना। जब हम खाना खाते हैं, तो शरीर में ग्लूकोज बढ़ता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए अग्न्याशय (पैंक्रियाज) से इंसुलिन निकलता है। यह इंसुलिन शुगर के स्तर को सामान्य बनाए रखता है। यदि इस प्रक्रिया में कोई समस्या आती है, तो व्यक्ति को मधुमेह हो सकता है। मरीजों में इसके शुरुआती लक्षणों में बार-बार पेशाब आना, बहुत अधिक प्यास लगना और पैरों या हाथों में झुनझुनी होना शामिल हैं। मानसिक तनाव भी मधुमेह बढ़ने का कारण हो सकता है। शुगर मरीजों को अक्सर कमजोरी महसूस होती है। बच्चों में अच्छा खाने के बावजूद वजन कम होना भी एक लक्षण है। यदि स्थिति गंभीर हो जाए, तो डायबिटिक कीटोएसिडोसिस जैसी मेडिकल इमरजेंसी उत्पन्न हो सकती है, जिसमें शरीर में पानी की कमी हो जाती है और मरीज कोमा में भी जा सकता है, जो जानलेवा भी हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को मधुमेह हो सकता है, इससे कैसे बचा जा सकता है?
प्रेमवती इनवाती, सिवनी
50% स्वस्थ महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल बदलाव के कारण मधुमेह की बीमारी देखी जाती है, जो बच्चे के जन्म के बाद सामान्य हो जाती है। लेकिन कुछ महिलाओं में यह जीवन भर बनी रह सकती है। ऐसे में महिलाओं को डाक्टर से परामर्श लेकर उपचार और देखभाल करनी चाहिए। मधुमेह के चार प्रकार होते हैं, जिसमें गर्भवती महिलाओं को होने वाले मधुमेह को जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है। इसके अलावा टाइप 1 (नो इंसुलिन) यह बीमारी आमतौर पर बचपन से ही शुरू हो जाती है और लगभग 10% लोगों में देखने को मिलती है। इसमें शरीर में इंसुलिन बिल्कुल नहीं बनता है। ऐसे मरीजों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं, क्योंकि इसमें दवाइयां काम नहीं करती हैं। टाइप 2 मधुमेह लगभग 90% मरीजों में पाया जाता है। 40 वर्ष से अधिक उम्र, आनुवंशिकता, आधुनिक जीवनशैली (जैसे बाहर का खाना, फास्ट फूड) और शारीरिक निष्क्रियता (शारीरिक व्यायाम की कमी) इसका मुख्य कारण होता है। प्री-डायबिटिक में मरीज का शुगर लेवल न तो बहुत ज्यादा होता है और न ही बहुत कम। यह बार्डरलाइन स्थिति है, जो भविष्य में (2-5 साल में) मधुमेह का रूप ले सकती है। इसे व्यायाम, सही आहार और नियमित जांच से नियंत्रित किया जा सकता है।
मधुमेह शरीर के किस अंग को अधिक प्रभावित करता है?
प्रवीण सनोड़िया, सिवनी
यदि शुगर को नियंत्रित न किया जाए, तो यह शरीर के चार मुख्य अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। आंखों की रोशनी को कम कर सकता है और मरीज को पूरी तरह से अंधा भी बना सकता है। किडनी खराब हो सकती है और मरीज को डायलिसिस की आवश्यकता पड़ सकती है। नसों में सुन्नपन आ सकता है, जिससे चोट लगने पर दर्द का एहसास नहीं होता और घाव जल्दी नहीं भरता। इससे गैंग्रीन होने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्राल बढ़ने से हृदय और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है।
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खानपान से मधुमेह की रोकथाम अथवा इसे नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है?
संतोष पंचेश्वर, सिवनी
मधुमेह रोगियों को मीठा, चावल और आलू इनका सेवन बिल्कुल बंद कर देना चाहिए। सिर्फ गेहूं की रोटी खाने से बचें इसकी बजाय ज्वार, बाजरा, मक्का और तिल जैसे अनाजों को मिलाकर मिक्स रोटी (मल्टीग्रेन) खाएं जो ज्यादा फायदेमंद है। अमरूद, पपीता, सेब, संतरा, जामुन और नाशपाती जैसे फल सुरक्षित हैं। लेकिन केला, आम, चीकू, अंगूर और लीची जैसे अत्यधिक मीठे फलों से बचना चाहिए। करेला, भिंडी, लौकी, तोरई, मेथी, गोभी, टमाटर, खीरा और ककड़ी बेझिझक खाएं। लेकिन स्टार्च से भरपूर सब्जियां जैसे शकरकंद (सकला), अरबी, जिमीकंद और चुकंदर न खाएं। सरसों (मस्टर्ड), मूंगफली (ग्राउंडनट), सूरजमुखी (सनफ्लावर) और तिल का तेल स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। राइस ब्रान आयल का भी उपयोग किया जा सकता है। लेकिन दिन भर में तेल की मात्रा 15 से 20 एमएल (करीब 3-4 चम्मच) से ज्यादा नहीं होनी चाहिए (जिसमें घी भी शामिल है)
प्री-डायबिटिक स्थिति की पहचान कैसे हो सकती है, इसे आगे बढ़ने से रोका जा सकता है?
अनिल मिश्रा, सिवनी
खाली पेट (फास्टिंग) शुगर 70 से 100 mg/dL तक सामान्य है। फास्टिंग शुगर के लिए कम से कम 8 घंटे तक कुछ न खाना आवश्यक है। अगर फास्टिंग शुगर 100 से 125 mg/dL के बीच है, तो यह प्री-डायबिटिक स्थिति है। 126 mg/dL से ऊपर होने पर मरीज को मधुमेह की श्रेणी में रखा जाता है। खाना खाने के दो घंटे बाद, 140 mg/dL से नीचे का शुगर स्तर सामान्य है, 140 से 200 mg/dL तक प्री-डायबिटिक है और 200 mg/dL से ऊपर होने पर मधुमेह माना जाता है। इसके अलावा, HbA1c टेस्ट से पिछले तीन महीने की औसत शुगर का पता चलता है, जिसमें 4 से 5.6 तक सामान्य, 5.6 से 7 तक प्री-डायबिटिक और 7 से ऊपर मधुमेह है। यदि आहार और व्यायाम से शुगर को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन समय-समय पर इसकी जांच कराई जाना चाहिए। अगर दिशा-निर्देशों का पालन करता है, तो वह प्री-डायबिटिक अवस्था को मधुमेह में बदलने से रोक सकता है और सुरक्षित रह सकता है।