
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। नेत्रदान के लिए इंदौर के लोगों में अब जागरूकता बढ़ने लगी है, हर वर्ष दान करने वालों की संख्या बढ़ रही है, जिससे लोगों की जिंदगी रोशन हो रही है। लेकिन चिंताजनक है कि दान किए गए करीब 30 प्रतिशत कॉर्निया मरीजों तक पहुंचने से पहले ही उपयोग के योग्य नहीं रहते हैं। इसके कारण चिकित्सकीय, तकनीकी और व्यवस्थागत हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे प्रमुख कारण कार्निया की गुणवत्ता होती है। मृत्यु के बाद आंखों का समय पर संग्रहण नहीं होने, कार्निया की कोशिकाओं की गुणवत्ता कम होने या पहले से मौजूद किसी रोग अथवा चोट के कारण कई कार्निया प्रत्यारोपण योग्य नहीं रह जाते। दाता की मेडिकल हिस्ट्री भी महत्वपूर्ण होती है।
एचआईवी, हेपेटाइटिस, गंभीर संक्रमण या अन्य संक्रामक रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों के कार्निया सुरक्षा कारणों से प्रत्यारोपण में उपयोग नहीं किए जाते। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद छह घंटे के भीतर कार्निया सुरक्षित निकालना जरूरी होता है। कई मामलों में स्वजन समय पर नेत्रदान की सूचना नहीं देते, जिससे कार्निया खराब हो जाता है। भारत में हर वर्ष एक लाख कार्निया प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, जबकि 2023 में देशभर में केवल 47,676 कार्निया ही संग्रहित हुए। इनमें से 29,057 का ही प्रत्यारोपण हो सका। यानी लगभग 39 प्रतिशत दान किए गए कार्निया उपयोग में नहीं आ पाए।
इंदौर नेत्रदान के मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यहां 12 वर्षो में 18500 से अधिक नेत्रदान हो चुके हैं। इंदौर में तीन आई बैंक संचालित हो रही है। इंदौर में कार्निया के लिए वेटिंग के हिसाब से नेत्रदान हो रहे हैं, जिसके चलते जरूरतमंदों को आसानी से कार्निया मिल रहा है। जानकारी अनुसार वर्ष 2024 में शहर में 2,237 नेत्रदान हुए थे, जो 2025 में बढ़कर 2,748 हो गए। यह लगभग 23 प्रतिशत की वृद्धि है।
प्रदेश में इंदौर नेत्रदान और अंगदान में पहले स्थान पर है। इंदौर के आई बैंक एसोसिएशन आफ इंडिया के सदस्य एवं समाजसेवी जीतू बगानी द्वारा छह हजार से अधिक कार्निया रिट्रीवल किए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि डेढ़ वर्ष के मासूम बच्चे से लेकर 104 वर्ष के बुजुर्ग तक के नेत्रदान सफलतापूर्वक संपन्न कराए हैं। मृत्यु जीवन का अंत हो सकती है, लेकिन किसी की आंखों की रोशनी किसी दूसरे के जीवन की शुरुआत बन सकती है। इसके अलावा अब तक 1500 से अधिक संकल्प पत्र भरवाकर लोगों को मृत्यु के बाद भी जीवन बांटने का संदेश दिया है। दें।
वर्ष 1960 में एमवाय अस्पताल के एक आपरेशन थिएटर में ऐसा इतिहास लिखा गया था जिसने भारत की नेत्र चिकित्सा को नई दिशा दी। नेत्र विशेषज्ञ प्रो. आरपी धंडा और उनकी टीम ने देश का पहला सफल कार्निया प्रत्यारोपण किया। एक मृत व्यक्ति की आंख से प्राप्त कार्निया को दूसरे व्यक्ति की आंख में प्रत्यारोपित कर उसकी रोशनी लौटाई गई।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, अधिकांश दाता वृद्ध आयु वर्ग के होते हैं, जिनकी कार्निया प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं रह जाती। दूसरा, मृत्यु के छह घंटे के भीतर कार्निया संग्रह की अनिवार्यता, जो दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी चुनौती है। तीसरा, कई बार उपयुक्त प्राप्तकर्ता या प्रत्यारोपण व्यवस्था समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती। यही कारण है कि स्वैच्छिक नेत्रदान से प्राप्त ऊतकों की उपयोग दर 22 से 28 प्रतिशत के बीच रहती है, जबकि अस्पताल-आधारित कार्निया संग्रह कार्यक्रमों में यह लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।