
योगेश कुमार गौतम, नईदुनिया बालाघाट। ‘जिस बेटे को पाल-पोसकर बड़ा किया, अच्छी शिक्षा दी, लेकिन उसी बेटे का दिमागी संतुलन बिगड़ते ही एक हंसता-खेलता परिवार बिखर गया। मेरी मां लक्ष्मीबाई (70) की जान उसके बेटे प्रसन्नजीत में ही बसती है। अपने बेटे को जी-भर के देख सके, इसलिए मेरी मां जिंदा है, लेकिन उसे अपने बेटे की जुदाई ने पागल बना दिया है। इसलिए वो न प्रसन्नजीत के पाकिस्तान की जेल में होने की बात मानती है, न ही अपने पति यानी मेरे पिता की मौत को स्वीकारती है।’
ये कहना है कि पाकिस्तान की जेल में निर्दोष होकर भी सात साल सजा काटने के बाद बाहर आए बालाघाट के खैरलांजी गांव के प्रसन्नजीत रंगारी (38) की बहन संघमित्रा खोबरागड़े (42) का। ‘नईदुनिया’ से चर्चा में संघमित्रा ने अपनी मां लक्ष्मीबाई की बेबसी की कहानी बयां की, जो भावुक करती है। लक्ष्मीबाई का सपना जल्द पूरा होने वाला है। उसका लाड़ला दो दिन बाद उसके सामने होगा। संघमित्रा कहती है कि बेटे के बिछड़ने के बाद से मां की दिमागी स्थिति बिगड़ गई है। वह खैरलांजी में कच्चे मकान में अकेले ही रहती है।
लक्ष्मीबाई आज भी ये मानने को तैयार नहीं कि उसका बेटा पाकिस्तान की जेल में कैद था। बेटी संघमित्रा व दामाद राजेश खोबरागड़े की कई कोशिशों के बाद भी लक्ष्मीबाई सच का सामना नहीं कर पा रही। वह कहती है- उसका बेटा जबलपुर में ही रहकर पढ़ाई कर रहा है। बेटी से कहती है- मुझे जबलपुर ले चल, बेटे से मिलना है, उसे देखना है, लेकिन प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में रहकर उस बुरे दौर से आजाद हुआ है, जहां कोई जाना नहीं चाहता। कई बार बेटी-दामाद ने प्रयास किए कि लक्ष्मीबाई उनके साथ ग्राम महकेपार में रहे, लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं है।
संघमित्रा बताती हैं कि मां की हालत देखी नहीं जाती। हमने कई बार उसे साथ चलने कहा। उसका बेटा धोखे से पाकिस्तान चला गया है, वहां की जेल में बंद है, बाबूजी नहीं रहे जैसी सच्चाई को वह किसी बच्चे की जिद की तरह मानने को तैयार नहीं है। थक-हारकर हम भी अब उसकी हां में हां मिला देते हैं, ताकि उसे तसल्ली मिल जाए। बूढ़ी, बीमार लक्ष्मीबाई गांव वालों की दया पर जिंदगी के आखिरी दिन गुजार रही है। लक्ष्मीबाई की बहन का बेटा कभी-कभार टिफिन में खाना लेकर घर आता है, तो कभी गांव वाले रोटी-सब्जी दे देते हैं। उसे पानी देने वाला भी कोई नहीं है। खैरलांजी में बगैर पति और बेटे के लक्ष्मीबाई अकेले बेबसी की जिंदगी गुजार रही है।
इससे पहले प्रसन्नजीत की मां और पिता वृद्धाश्रम में भी रहे। फिर उन्हें बेटी-दामाद अपने घर ले आए, लेकर कुछ दिन बाद लक्ष्मीबाई अपने गांव खैरलांजी लौट गई। संघमित्रा कहती है- शायद, अपने बेटे को देखकर मेरी मां संभल जाए, पहले जैसे हो जाए।
लक्ष्मीबाई की दयनीय स्थिति के कारण उसे गांव में कोई अपने घर नहीं बुलाता। न ज्यादा बातचीत करता है। बस, उसे पेट भरने लायक खाना दे देते हैं। मां को बेटे को याद करके खूब रोती है। संघमित्रा बताती है कि मां-बाप की शादी के 14 साल बाद मैं पैदा हुई। उसके तीन साल बाद मेरे छोटे भाई प्रसन्नजीत का जन्म हुआ। प्रसन्नजीत हम सबका लाड़ला है। मां उसे बहुत चाहती है इसलिए उसकी जुदाई ने मां को पागल बना दिया है।
पाक से रिहा होने के बाद प्रसन्नजीत अभी अमृतसर के मंजीठा थाने में है। उसे लेने के लिए उसके जीजा राजेश खोबरागड़े, ग्राम रोजगार सहायक, पुलिस आरक्षक सहित दो चालक मंगलवार दोपहर लगभग तीन बजे अमृतसर के लिए सड़क मार्ग से रवाना हुए हैं। स्वजन ने बताया कि वे रात 9-10 बजे तक अमृतसर पहुंच जाएंगे। गुरुवार को थाने में कागजी कार्रवाई के बाद बालाघाट के लिए रवाना होंगे। संभावना है कि दो-तीन दिन में स्वजन प्रसन्नजीत को लेकर बालाघाट पहुंचेंगे।