
योगेश कुमार गौतम, नईदुनिया बालाघाट: निर्दोष होकर भी पिछले 14 वर्षों से पाकिस्तान की जेल में सजा (वनवास) काट रहा बालाघाट के खैरलांजी गांव का प्रसन्नजीत रंगारी उर्फ सुनील अड़े (38) अब आजाद है। शनिवार को पाकिस्तान ने सात भारतीयों को अपनी जेल से रिहा कर दिया। इसमें बालाघाट के वारासिवनी तहसील के खैरलांजी गांव का प्रसन्नजीत भी शामिल हैं।
प्रसन्नजीत को पाकिस्तान की जेल से आजाद कराने के लिए उसकी बहन संघमित्रा खोबरागड़े ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया था। शासन-प्रशासन से कई बार आवेदन किए। आखिरकार, संघमित्रा का अपने छोटे भाई को सकशुल घर लाने का सपना सच हो गया है।
नईदुनिया से चर्चा में संघमित्रा ने कहा- आज वर्षों का सपना सच हो गया है। खुशी बयां करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। मां को ये खुशखबरी नहीं दी है, उन्हें सरप्राइज (उपहार) देना चाहती हूं। एक मां को वर्षाें बाद उसके बेटे से मिलाने की खुशी संभाली नहीं जा रही।
संघमित्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया है। प्रसन्नतजीत को लेने आज सोमवार को उसके जीजा राजेश खोबराड़े व एक ग्रामीण अमृतसर रवाना होंगे। मंगलवार तक प्रसन्नतजीत अपने वतन, अपने घर लौटेगा। प्रसन्नतजीत को पाकिस्तान की जेल से रिहा कराने में पूर्व जिला पंचायत सदस्य विक्रम देशमुख ने अहम भूमिका निभाई है।
रिहाई के बाद पाकिस्तान रेंजर्स ने सभी नागरिकों को अटारी-वाघा सीमा पर बीएसएफ के हवाले कर दिया। भारत ने कस्टम और इमिग्रेशन की प्रक्रिया पूरी की। सभी भारतीय नागरिकों को एंबुलेंस से गुरु नानक देव अस्पताल अमृतसर ले जाकर मेडिकल जांच कराई गई।
पाकिस्तान ने सात भारतीयों का रिहा किया है। इनमें छह भारतीय अपने घर लौट चुके हैं, लेकिन बालाघाट का प्रसन्नजीत पंजाब के अमृतसर स्थित रेडक्रास भवन के मंजीठा थाना में है। थाने के सहायक उप निरीक्षक ने प्रसन्नजीत के परिजनों को उसकी रिहाई की सूचना दी थी। वहां प्रसन्नजीत स्वस्थ्य और खुश है।
प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा ने ‘नईदुनिया’ से बातचीत में बताया कि मंजीठा थाने से शनिवार को जब प्रसन्नजीत की रिहाई का फोन आया, तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हमने वहां की पुलिस से प्रसन्नजीत को बालाघाट लाने का निवेदन किया, लेकिन उन्होंने इसमें असमर्थता जताई। दरअसल, मैं या मेरे परिवार का कोई भी सदस्य कभी ट्रेन में नहीं बैठा। न हमें ट्रेन के बारे में कोई जानकारी है।अंतत: मेरे पति यानी प्रसन्नजीत के जीजा व एक ग्रामीण ने अमृतसर जाने का फैसला लिया है।
बता दें कि संघमित्रा बीड़ी बनाने का काम करती है। परिवार में प्रसन्नजीत के पिता लोपचंद रंगारी की दो वर्ष पहले मृत्यु हो गई थी। उसकी बूढ़ी मां है, जो अपने बेटे के लौटने की आस देख रही थी। ये सपना भी अब पूरा हो गया है।
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प्रसन्नजीत को पाकिस्तान की जेल से आजाद कराने के लिए बहन संघमित्रा ने केंद्र, राज्य, स्थानीय जिला प्रशासन को कई बार पत्र लिखे। राजनेताओं और पार्टी कार्यालयों की खाक छानी। जनसुनवाई में ढेरों आवेदन दिए, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। पिछले वर्ष रक्षाबंधन पर प्रसन्नजीत के लिए राखी भेजी, लेकिन पहलगाम हमले के कारण उसका ये सपना भी अधूरा रह गया।
बता दें कि प्रसन्नजीत अचानक लापता हो गया था। परिवार ने उसके जिंदा होने की आस छोड़ दी थी। 2021 में परिवार को पता चला कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान की लाहौर की कोटलकपत जेल में बंद है। परिजनों की मानें तो कॉलेज की पढ़ाई के बाद उसका मानसिक संतुलन बिगड़ गया था। भटकते हुए वह पाकिस्तान सीमा में प्रवेश कर गया। 2023 में लाहौर जेल से छूटकर आए जम्मू-कश्मीर के कुलदीप सिंह ने प्रसन्नजीत के पाकिस्तान की सेंट्रल जेल में होने की जानकारी बहन संघमित्रा को दी। वहां की पुलिस ने उसका नाम ‘सुनील अदह’ लिखा हुआ था।
परिजनों के अनुसार, प्रसन्नजीत पढ़ाई में तेज था। कर्ज लेकर उसके पिात लोपचंद ने उसे पढ़ने के लिए जबलपुर के गुरु रामदास खालसा इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी से बी-फार्मेसी की पढ़ाई के लिए भेजा था। पढ़ाई पूरी कर साल 2011 एमपी स्टेट फार्मेसी काउंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन किया था। इसके बाद वह आगे की पढ़ाई करना चाहता था। उसे फिर पढ़ने भेजा भी गया, लेकिन वह मानसिक स्थिति खराब होने से आगे पढ़ाई छोड़ घर आ गया।
इसके बाद वह घर छोड़कर भाग गया था। आठ माह बाद बिहार से लौट आया और बहन संघमित्रा के घर रहने लगा। दोबारा घर से भागने के बाद वह सीधे पाकिस्तान पहुंच गया और 14 वर्ष का वनवास काटा।