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    दो लाख मरीजों को आंखों की रोशनी का इंतजार : MP में हर साल 6 हजार कॉर्निया की जरूरत, मिलते हैं सिर्फ डेढ़ हजार

    प्रदेश में हर साल करीब 6 हजार कॉर्निया की सख्त जरूरत होती है, लेकिन सालाना महज 1,500 कॉर्निया ही मिल पाता है। करीब 75 प्रतिशत मरीजों को लंबा इंतजार कर...और पढ़ें

    By mukesh vishwakarmaEdited By: bhupendra Singh Rajput
    Publish Date: Wed, 10 Jun 2026 10:36:13 AM (IST)Updated Date: Wed, 10 Jun 2026 10:39:01 AM (IST)
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    दो लाख मरीजों को आंखों की रोशनी का इंतजार : MP में हर साल 6 हजार कॉर्निया की जरूरत, मिलते हैं सिर्फ डेढ़ हजार
    दो लाख से अधिक मरीज कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में शामिल हैं। फोटो एआई से बनाई गई है।

    HighLights

    1. प्रदेश में हर साल 6,000 कॉर्निया की जरूरत, लेकिन केवल 1,500 ही उपलब्ध हो पा रहे हैं
    2. दो लाख से अधिक मरीज कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में शामिल हैं
    3. सोटो ने जिला अस्पतालों तक कॉर्निया कलेक्शन और ट्रांसप्लांट सुविधा विस्तार की योजना बनाई है

    नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस (कॉर्निया की खराबी से होने वाली दृष्टिहीनता) से जूझ रहे हजारों मरीजों के लिए रोशनी का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। स्थिति यह है कि प्रदेश में हर वर्ष करीब 6,000 कॉर्निया की आवश्यकता होती है, लेकिन जागरूकता और संसाधनों की कमी के कारण केवल 1,500 कॉर्निया ही उपलब्ध हो पाते हैं।

    परिणामस्वरूप करीब 75 प्रतिशत मरीजों को लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

    स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्तमान में दो लाख से अधिक मरीज कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में हैं। हर वर्ष इस सूची में 1,500 से 1,800 नए मरीज और जुड़ जाते हैं।


    बड़े शहरों तक सीमित है सुविधा

    वर्तमान में कॉर्निया प्रत्यारोपण की सुविधा केवल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों तक सीमित है। इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज में सबसे अधिक, करीब 100 कॉर्निया प्रत्यारोपण प्रतिवर्ष किए जाते हैं।

    मांग और उपलब्धता के बीच बढ़ती खाई को देखते हुए सोटो ने प्रदेश के जिला अस्पतालों तक यह सुविधा विस्तार देने का निर्णय लिया है। पहले चरण में इंदौर और उज्जैन संभाग के 15 जिलों में विशेष कॉर्निया कलेक्शन और प्रत्यारोपण केंद्र स्थापित किए जाएंगे।

    यह भी पढ़ें- विश्व नेत्रदान दिवस: रोशनी बनने से पहले बुझ रही उम्मीद, 30 प्रतिशत कॉर्निया हो रहे वेस्ट

    जागरूकता की कमी सबसे बड़ी चुनौती

    एम्स भोपाल के नेत्र रोग विभाग की प्रमुख डॉ. भावना शर्मा के अनुसार, नेत्रदान को लेकर समाज में फैली भ्रांतियां आज भी सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने बताया कि एक मृत व्यक्ति के नेत्रदान से दो दृष्टिहीन मरीजों को रोशनी मिल सकती है, क्योंकि दोनों आंखों से प्राप्त कॉर्निया अलग-अलग दो मरीजों को प्रत्यारोपित किए जाते हैं।

    नेत्रदान में समय का विशेष महत्व

    विशेषज्ञों के अनुसार मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया सुरक्षित निकालना आवश्यक होता है। इसलिए किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद परिजन यदि नेत्रदान के लिए सहमति देते हैं तो तुरंत निकटतम आई बैंक को सूचना देनी चाहिए।

    डॉक्टरों की टीम आने तक कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं:

    - शव के आसपास चल रहे पंखे बंद कर दें।

    - आंखों पर साफ और गीली रुई या कपड़ा रखें।

    - मृतक के सिर के नीचे तकिया रखकर सिर को थोड़ा ऊंचा रखें।

    हर जिले में सुविधा विकसित करने की जरूरत

    सोटो के पूर्व संचालक डॉ. संजय दीक्षित का कहना है कि वर्तमान में प्रदेश की कुल जरूरत का केवल 20 से 25 प्रतिशत कॉर्निया ही दान के रूप में मिल पा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि कॉर्निया डोनेशन और ट्रांसप्लांट की सुविधाएं अभी केवल बड़े शहरों तक सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों तक यह व्यवस्था पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

    नेत्रदान को लेकर सामाजिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की सख्त जरूरत है। वर्तमान में मांग और आपूर्ति के बीच एक बड़ा अंतर है, जिसके कारण हजारों मरीजों को रोशनी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। इस कमी को दूर करने के लिए हर जिला अस्पताल में कार्निया ट्रांसप्लांट और कलेक्शन की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।- डॉ. श्वेता वालिया, कार्निया ट्रांसप्लांट इंचार्ज, सोटो, मप्र।