
शशिकांत तिवारी, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले की घोड़ामाड़ा गुफा, जिसे बैगा आदिवासी जामवंत गुफा भी मानते हैं, उसमें सदियों से पड़ी रही विशेष बनावट एवं बड़े आकार की खोपड़ी व पैर की हड्डियों से मानव विकास के क्रम और मध्य प्रदेश में उसकी पहली उपस्थिति जानने के नए रास्ते खुल सकते हैं। पुरातत्व, फासिल्स जैसे विषयों पर कई वर्षों से अध्ययन कर रहीं गायनकोलाजिस्ट डॉ. प्रियंका घोष को डिंडौरी भ्रमण के दौरान स्थानीय लोगों ने एक खोपड़ी दिखाई। इसमें वोर्मियन बोन (हड्डी) दिखी। डॉ. प्रियंका के अनुसार, यह हड्डी आठ से 10 लाख वर्ष पहले मानव में पाई जाती थी।
यह समय मानव विकास में होमोइरेक्टस (सीधा खड़ा हो सकने वाले और वर्तमान से अधिक ऊंचाई वाले) से आज के मानव होमोसेपियंस बनने के संक्रमण काल का माना जाता है। इसी गुफा में पैर की हड्डियां भी मिलीं, जिनका डॉ. घोष ने फोरेंसिक विशेषज्ञों, एंथ्रोपोलाजिस्ट से परीक्षण कराया। शोध पत्रों के माध्यम से अध्ययन किया, जिससे पता चला कि यह मानव आठ से 10 फीट लंबा, बड़ी खोपड़ी वाला था। इससे प्रारंभिक निष्कर्ष में माना जा रहा है 10 लाख वर्ष पहले भी यहां मानव की उपस्थिति रही होगी। यह खोपड़ी अभी डिंडौरी में ही घुघवा फासिल पार्क में रखी है।
उल्लेखनीय है कि अभी मध्य प्रदेश में मानव की उपस्थिति का आधार भीमबेटका के शैल चित्रों के आधार पर 10 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। मानव के विकास के क्रम में जिस तरह से 'पेरू मैन', 'जावा मैन' का नाम दिया गया है, उसी तरह डॉ. प्रियंका घोष ने इसे 'डिंडौरी मैन' कहा है। बता दें कि नर्मदा नदी के किनारे स्थित डिंडौरी में डायनासोर के फासिल्स, मूंगे के फासिल्स और आस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले नीलगिरी के पेड़ के जीवाश्म भी मिल चुके हैं।
भूगर्भीय संरचना की दृष्टि से जबलपुर से डिंडौरी तक लमेटा संरचना यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है। अब घोड़ामाड़ा गुफा की दुनिया में नई पहचान बन सकती है। गुफा इतनी बड़ी और गहरी है कि इससे माना जा रहा है कि यह बड़े मानव समूह के आश्रय स्थल के रूप में रही होगी। यहां पत्थर से बने हथियार भी मिले हैं।
खोपड़ी में वाई-आकार की स्यूचर (हड्डियों के जोड़) संरचना होती है। वोर्मियन बोन में प्रमुख सपाट हड्डियों के अतिरिक्त इनके जोड़ के बीच छोटी हड्डी भी होती है, जिसका कोई निश्चित आकार नहीं होता। यह शरीर रचना की एक विशेषता है। जीन समान होने के कारण यह आज के मानव में भी मिल सकती है, लेकिन बहुत ही दुर्लभ है। इस कारण शरीर रचना (एनाटमी) की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को भी इसके बारे में नहीं पढ़ाया जाता।
डिंडौरी की गुफा में मिले खोपड़ी के बड़े आकार और पैर की लंबी हड्डियां और बड़े जबड़े को देखते हुए डॉक्टर और विज्ञानी पूरी तरह से यह मान रहे हैं कि यह खोपड़ी आधुनिक मानव की नहीं हो सकती। इससे यह संभावना भी उठती है कि कभी आठ से 10 फीट लंबा मानव रहा होगा। डॉ. प्रियंका का कहना है खोपड़ी की आयु जो भी हो पर वोर्मियन बोन का पैटर्न आठ से 10 लाख वर्ष पुराना है।
आयुक्त पुरातत्व संचालनालय एवं अभिलेखागार मदन कुमार नागरगोजे का कहना है राज्य संग्रहालय में एक गैलरी बनाकर घोड़ामाड़ा की गुफा में मिली सामग्री को रखा जाएगा। ऑडियो विजुअल रिक्रिएशन किया जाएगा। खोपड़ी की आयु पता करने के लिए कार्बन डेटिंग सहित अन्य परीक्षण कराए जाएंगे। इससे एंथ्रोपोलाजिस्ट, डॉक्टर व अन्य संबंधित विज्ञानियों को आगे शोध के रास्ते खुलेंगे।
स्थानीय लोग खासतौर पर बैगा आदिवासी जिस जामवंत गुफा को आस्था से जोड़ते आए हैं वहीं से प्रागैतिहासिक मानव उद्विकास पर इतिहास लेखन को नई दिशा मिलेगी। उन्होंने बताया कि वोर्मियन बोन की समानता वाली खोपड़ी पेरू में भी पाई गई है, जिससे साबित होता है कि पहले सभी महाद्वीप एक थे, जैसा कि अल्फ्रेड वेगनर ने भी कहा है।