
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। दृढ़ इच्छाशक्ति और डॉक्टरों की मेहनत से असंभव भी संभव हो जाता है। इसका उदाहरण बने सागर के 13 वर्षीय अभि, जिसने एक गंभीर बीमारी से साढ़े तीन महीने की लंबी लड़ाई के बाद जीत हासिल की। हमीदिया अस्पताल के बाल एवं शिशु रोग विभाग की टीम के प्रयासों से अब अभि स्वस्थ होकर घर जा रहा है।
अभि को 13 अप्रैल 2026 को गंभीर हालत में सागर से रेफर कर हमीदिया लाया गया था। जांच में पता चला कि वह गिलियन-बैरे सिंड्रोम (GBS) से पीड़ित है। इस बीमारी में शरीर की नसें कमजोर हो जाती हैं। अभि के दोनों हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया था। हालत इतनी गंभीर थी कि उसकी सांस लेने की मांसपेशियां भी काम नहीं कर रही थीं।
जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने तुरंत उसे वेंटिलेटर पर रखा। इम्यूनोग्लोबुलिन के इंजेक्शन दिए गए और लंबे समय तक सांस देने के लिए ट्रेकियोस्टॉमी भी की गई। इलाज के दौरान उसे निमोनिया भी हो गया। इसके बावजूद विभागाध्यक्ष डॉ. मंजूषा गोयल के नेतृत्व में डॉ. राजेश टिक्कस, डॉ. रश्मि रंधा, डॉ. भारती, डॉ. नवनीत खंडेलवाल और नर्सिंग स्टाफ ने दिन-रात मेहनत की।
लगभग 48 दिन बाद 29 मई को अभि को वेंटिलेटर से हटाया जा सका। धीरे-धीरे उसकी मांसपेशियों में ताकत लौटने लगी। करीब 3.5 महीने के उपचार के बाद अब उसे डिस्चार्ज किया जा रहा है। आगे घर पर फिजियोथेरेपी और नियमित जांच करानी होगी।
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अभि के पिता का पहले ही निधन हो चुका है। मां और भाई ने पूरे समय हिम्मत नहीं हारी। आयुष्मान भारत योजना के तहत उसका पूरा इलाज हुआ। जीएमसी की डीन डॉ. कविता एन सिंह और अधीक्षक डॉ. सुनीत टंडन ने बताया कि सरकारी अस्पतालों में भी गंभीर बीमारियों का उच्चस्तरीय इलाज संभव है।