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एमपी में मुफ्त साइकिल-स्कूटर भी बेअसर! प्राइमरी में लगभग 100% हाजिरी, लेकिन 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते काफी बच्चे छोड़ रहे स्कूल

प्रदेश के सरकारी स्कूलों में 21 छात्रों पर एक शिक्षक, फिर भी 12वीं तक नहीं पहुंच पा रहे आधे बच्चे

By Anjali raiEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sun, 12 Jul 2026 09:51:35 AM (IST)Updated Date: Sun, 12 Jul 2026 09:51:35 AM (IST)
एमपी में मुफ्त साइकिल-स्कूटर भी बेअसर! प्राइमरी में लगभग 100% हाजिरी, लेकिन 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते काफी बच्चे छोड़ रहे स्कूल
12वीं क्लास तक पहुंचते-पहुंचते काफी बच्चे छोड़ रहे स्कूल (फाइल फोटो)

HighLights

  1. यूडाइस प्लस 2025-26 की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है
  2. 12वीं क्लास तक पहुंचते-पहुंचते काफी बच्चे छोड़ रहे स्कूल
  3. शिक्षक अनुपात में MP राष्ट्रीय मानक से आगे, पर ड्रॉपआउट से बढ़ी टेंशन

नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश शासन में स्कूल चलें हम, निश्शुल्क पाठ्यपुस्तक, गणवेश,लैपटाप, स्कूटर, साइकिल वितरण और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं के माध्यम से नामांकन बढ़ाने का प्रयास कर रही है। अब सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को केवल स्कूल तक लाना नहीं, बल्कि उन्हें 12वीं तक शिक्षा व्यवस्था में बनाए रखना है। प्रायमरी से उच्च माध्यमिक कक्षाओं में पहुंचते-पहुंचते आधे विद्यार्थी स्कूल छोड़ रहे हैं। इसका खुलासा शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस प्लस 2025-26 रिपोर्ट में हुआ है। इसमें मध्यप्रदेश की स्कूली शिक्षा की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आई है।

एक ओर प्रदेश के स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के निर्धारित मानकों से बेहतर है। वहीं दूसरी ओर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों का स्कूल छोड़ना बड़ी चुनौती बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में करीब 1।52 करोड़ विद्यार्थी और 1,19,694 विद्यालय हैं। यहां औसतन हर 21 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है, जबकि एनईपी के अनुसार 30:1 का अनुपात आदर्श माना गया है।


एक शिक्षक के भरोसे 2,269 स्कूल

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में प्रति विद्यालय औसतन 126 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इसके बावजूद शिक्षकों और संसाधनों का समान वितरण अब भी चुनौती बना हुआ है। विशेषकर ग्रामीण, दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में कई विद्यालय ऐसे हैं, जहां पर्याप्त शिक्षकों की कमी बनी हुई है। सबसे चिंता की बात यह है कि प्रदेश में 2,269 एकल शिक्षक वाले विद्यालय हैं, जिनमें 62,151 विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। ऐसे विद्यालयों में एक ही शिक्षक को सभी कक्षाओं और विषयों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

उच्च माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 13 प्रतिशत है

रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में बच्चों का स्कूल में नामांकन तो बेहतर हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएं आगे बढ़ती हैं, विद्यार्थियों का स्कूल में टिके रहना कम होता जाता है। प्राथमिक स्तर पर ड्रापआउट दर केवल 0।1 प्रतिशत है, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर पर 13 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में विद्यार्थी 9वीं से 12वीं के बीच किसी न किसी कारण से पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। प्रदेश स्तर के आंकड़े बताते हैं कि प्राथमिक स्तर पर अधिकांश विद्यार्थी शिक्षा व्यवस्था में बने रहते हैं, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या काफी कम हो जाती है।

यह भी पढ़ें- उज्जैन में छात्र-शिक्षक विवाद... छात्र को घसीटकर पीटने वाले शिक्षक ने मांगी माफी, अंग्रेजी न आने पर शिक्षिका ने किया था अपमानित

मप्र का ड्रापआउट दर

शिक्षा स्तर -ड्रापआउट दर

प्राथमिक -0।1 फीसद

माध्यमिक -6।2 फीसद

उच्च माध्यमिक -13 फीसद

केवल बेहतर शिक्षक-छात्र अनुपात से शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होगी। विद्यार्थियों को विद्यालय में बनाए रखने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त विषयवार शिक्षक, सुरक्षित विद्यालय वातावरण, छात्रवृत्ति, परिवहन सुविधा, करियर मार्गदर्शन और माध्यमिक विद्यालयों तक आसान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। शिक्षाविद डा। दामोदर जैन।

वर्तमान शैक्षणिक सत्र में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) में सुधार हुआ है। स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान कर उन्हें पुनः नामांकित किया जाएगा। साथ ही विद्यार्थियों को कौशल एवं स्वरोजगार से जोड़ने पर भी विशेष ध्यान रहेगा।नंदा भलावे कुशरे, अपर परियोजना संचालक, लोक शिक्षण संचालनालय।