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नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। पूर्व आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या का आरोपित वरुण कुमार अब सलाखों के पीछे है। आरोपित राजधानी में सनसनी फैला देने वाली वारदात कर तब भाग निकला, जब पुलिस को घटना का पता ही नहीं चल सका था। 33 दिन पुलिस की 10 से ज्यादा टीमें मैदान में और अलग-अलग साइबर की टीमें उसकी एक-एक मूवमेंट की तलाश में थीं।
लेकिन आरोपित बेखौफ और बेफिक्र होकर अलग-अलग शहरों में घूमता रहा और 33 दिन तक पुलिस को आसानी से छकाता रहा। उसे यकीन था कि मोबाइल का उपयोग न करने पर पुलिस कभी उसे पकड़ ही नहीं पाएगी और लूटी गई रकम से वह यूं ही ऐश करता रहेगा।
यूं तो वरुण पहले ही बता चुका है कि परिवार में उसे माता-पिता से ज्यादा लगाव नहीं है, लेकिन पंजाब में रहने वाली उसकी बहन को दोस्त के फोन से एक कॉल किया तो पहले से ही अलर्ट मोड पर चल रही पुलिस तुरंत ही सचेत हो गई और जिस नंबर से बहन को फोन पहुंचा था, उसकी पूरी जानकारी खंगाल ली। पुलिस तुरंत फोन करने वाले उसके दोस्त तक पहुंची और फिर उसके माध्यम से मंडली बनाकर घूम रही पुलिस की टीम अलग भेष में पहुंचकर घेराबंदी कर आरोपित वरुण कुमार को गिरफ्तार कर लिया।
हत्या के बाद वरुण लगातार अपने ठिकाने बदलता रहा। फरारी के दौरान वह हरिद्वार और ऋषिकेश में रहा। इसके बाद दिल्ली, ग्वालियर और मथुरा सहित कई शहरों में घूमता रहा। मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करने और लगातार शहर बदलने के कारण पुलिस को उसकी लोकेशन तलाशने में चुनौती मिली। वह लूट की रकम के सहारे ठिकाने बदलता और गिरफ्तारी से बचता रहा।
वारदात के बाद वरुण अपने साथ लूटे गए डॉलर लेकर फरार हुआ था। उसने दिल्ली में इन्हें एक्सचेंज करवाकर भारतीय मुद्रा हासिल की। इसी रकम से वह अलग-अलग शहरों में रहने और अपनी जरूरतें पूरी करने का खर्च उठा रहा था। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि कितने डॉलर एक्सचेंज कराए गए और उनसे मिली रकम कहां-कहां खर्च की गई।
वरुण 33 दिन तक अलग-अलग शहरों में घूमता रहा, लेकिन इस दौरान उसे ठहरने, आने-जाने और खर्च के लिए मदद किसने दी, पुलिस इसकी पड़ताल कर रही है। पूछताछ में उसके संपर्क में रहे दोस्तों और परिचितों की जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि फरारी के दौरान उसे किसने पनाह दी थी।
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