
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्यप्रदेश में किडनी की बीमारियां गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप लेती जा रही हैं। प्रदेश की लगभग 17.5 प्रतिशत वयस्क आबादी क्रोनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) की चपेट में है। राज्य के करीब 1.5 करोड़ लोग किडनी की किसी न किसी समस्या से जूझ रहे हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हर साल 13 हजार से 22 हजार नए मरीज ऐसी स्थिति में अस्पताल पहुंच रहे हैं, जहां उनकी किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर चुकी होती है। यह आंकड़े इंडियन जर्नल ऑफ नेफ्रोलॉजी के हैं।
अध्ययन बताता है कि प्रदेश के पूर्वी हिस्से यानी बघेलखंड और महाकौशल क्षेत्र में किडनी रोगियों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है। शहडोल, अनूपपुर, रीवा और बालाघाट ऐसे जिले हैं, जहां से बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं। इसके अलावा सिंगरौली, सतना, छिंदवाड़ा और मंडला में भी मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, दूषित पानी में फ्लोराइड और भारी धातुओं की मौजूदगी के साथ-साथ बिना डाक्टरी सलाह के दर्द निवारक दवाओं (पेन किलर्स) का अंधाधुंध सेवन इस साइलेंट किलर को न्योता दे रहा है।
एम्स भोपाल में 18वां सफल ट्रांसप्लांट, पिता ने दिया जीवनदान बढ़ते खतरों के बीच एम्स भोपाल में बुधवार को 18वां किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। एक 22 वर्षीय युवक को उसके पिता ने अपनी किडनी दान कर नया जीवन दिया। यह नर्मदापुरम का रहने वाला है। एम्स भोपाल में अब तक हुए कुल ट्रांसप्लांट में से चार ब्रेन डेड मरीजों (अंगदान) के माध्यम से हुए हैं, जबकि 14 मामलों में परिवार के किसी जीवित सदस्य ने किडनी दान की है।
एम्स भोपाल के यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डा. केतन मेहरा ने बताया कि संस्थान में वर्तमान में अत्याधुनिक दूरबीन पद्धति से किडनी स्टोन (पथरी) का सफल उपचार किया जा रहा है। आने वाले समय में सुविधाओं का विस्तार करते हुए पीडियाट्रिक विभाग में बच्चों का किडनी ट्रांसप्लांट भी शुरू किया जा सकेगा। इससे प्रदेश के मासूम बच्चों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों में नहीं भटकना होगा।
एम्स भोपाल में अब यूरोलॉजी की जटिल सर्जरी को और अधिक सुरक्षित और सटीक बनाने के लिए आधुनिक 'थ्री-डी प्रिंटिंग' तकनीक का सहारा लेने जा रहा है। एम्स के यूरोलॉजी विभाग ने एक ऐसी शोध परियोजना पर काम शुरू किया है, जिसके तहत मरीज की किडनी का हूबहू 3-डी प्रिंटेड आर्टिफिशियल मॉडल तैयार किया जाएगा। इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य ऑपरेशन टेबल पर जाने से पहले ही सर्जन को मरीज की किडनी की आंतरिक बनावट और पथरी या ट्यूमर की सटीक स्थिति का अभ्यास (मॉक ड्रिल) कराना है।
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इस शोध के लिए मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद ने एम्स को नौ लाख रुपये का विशेष अनुदान स्वीकृत किया है। अक्सर किडनी स्टोन के मामलों में हर मरीज की शारीरिक संरचना अलग होती है। इस थ्री-डी माडल की मदद से डाक्टर यह पहले ही तय कर सकेंगे कि सर्जरी के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता कौन सा है।