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MP OBC Reservation: युवाओं का भविष्य बर्बाद कर कांग्रेस भी खाली हाथ! लाखों युवा योग्य होने के बावजूद भर्ती से रहे वंचित

अब सोचिए कि जो लोग चयनित हो गए, वे वर्षों से नौकरी कर रहे होंगे और अब 13 प्रतिशत पद पर चयनित युवाओं की वरिष्ठता भी प्रभावित होगी, यानी उन्हें वरिष्ठता...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Fri, 09 Oct 2026 10:34:10 PM (IST)Updated Date: Fri, 09 Oct 2026 10:34:10 PM (IST)
MP OBC Reservation: युवाओं का भविष्य बर्बाद कर कांग्रेस भी खाली हाथ! लाखों युवा योग्य होने के बावजूद भर्ती से रहे वंचित
ओबीसी आरक्षण विवाद का राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण।

HighLights

  1. ओबीसी आरक्षण विवाद का राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषण
  2. 2019 की अफरातफरी से लेकर 2026 के फैसले तक का सफर
  3. कांग्रेस के 27% आरक्षण के दांव से युवाओं को मिला असमंजस

धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। आरक्षण का मसला सियासत से लेकर आम आदमी की जिंदगी तक, सरकार से लेकर अदालतों तक और युवाओं के भविष्य तक को गहराई से प्रभावित करता रहा है। सामाजिक बदलाव के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस मुद्दे पर जनवरी 2019 में मध्य प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जिस अपरिपक्वता, लापरवाही और अदूरदर्शिता के साथ फौरी कदम बढ़ाया, उसने सरकारी भर्ती के लिए प्रयास कर रहे लाखों मेधावी युवाओं का भविष्य तो चौपट किया ही, लेकिन कांग्रेस को भी इसका फायदा नहीं मिला।

आज जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शासकीय सेवाओं की भर्ती में ओबीसी के लिए आरक्षण की सीमा 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के मामले को खारिज कर दिया, तो उन युवाओं की पीड़ा एक बार फिर ताजा हो गई है, जिनका भविष्य इस मामले के कोर्ट में जाने के कारण बर्बाद हो गया।


हड़बड़ी में लिया गया फैसला और संवैधानिक सीमा की अनदेखी

दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ा दांव खेलने के फेर में तत्कालीन कमल नाथ सरकार ने प्रदेश में ओबीसी की जनसंख्या, उनकी आवश्यकताओं और शासकीय सेवा में उनके लिए जगह बनाने आदि की प्रारंभिक जानकारी या कहें पर्याप्त सर्वे के बिना ही हड़बड़ी में ओबीसी का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की घोषणा कर दी। इसके हश्र का पूरा अनुमान होने के बावजूद इसके कानूनी पक्ष और संवैधानिक मर्यादाओं को नहीं समझा गया। ऐसे में यह मामला कोर्ट में जाकर लंबे समय तक उलझना शुरू से ही तय था।

देश में संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण असंभव है, यह जानते हुए भी कमल नाथ सरकार ने ऐसी लापरवाही की, जिसका नतीजा हुआ कि कोर्ट में लंबी सुनवाई के चलते भर्ती परीक्षाओं में अस्पष्टता बनी रही और लाखों युवा योग्य होने के बावजूद भर्ती से वंचित रह गए।

दो सूचियों का उलझाव और राजनीतिक नुकसान

अदालत के संभावित निर्णय को मद्देनजर रखते हुए पिछली सरकार ने 13 प्रतिशत पदों की चयन प्रक्रिया ही रोक ली और ओबीसी व अनारक्षित वर्ग की दो सूची बनाई गईं। अब सोचिए कि जो लोग चयनित हो गए, वे वर्षों से नौकरी कर रहे होंगे और अब 13 प्रतिशत पद पर चयनित युवाओं की वरिष्ठता भी प्रभावित होगी, यानी उन्हें वरिष्ठता पाने के लिए एक और कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। इसका जिम्मेदार कौन है।

यह भी पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट पहुंचा आदिवासी बच्चों की मौत का मामला, केंद्र और राज्यों को नोटिस, शीर्ष अदालत ने जताई चिंता

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस का यह कदम उसके लिए फायदे का सौदा रहा, बल्कि मामला कोर्ट में जाने के बाद के लगभग सभी चुनावों में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद उसी साल हुए विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।

2019 के लोकसभा चुनाव में उसकी प्रदेश में सिर्फ एक लोकसभा सीट छिंदवाड़ा ही बची रह गई। वह भी 2024 के चुनाव में हाथ से निकल गई। फिलहाल लोकसभा में मध्य प्रदेश से कांग्रेस का कोई सांसद नहीं है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी पराजय हुई। कांग्रेस से युवाओं की दूरी में आरक्षण के मुद्दे की बड़ी भूमिका रही है।