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मध्य प्रदेश में UCC कानून से बाहर रह सकते हैं मतांतरित आदिवासी, विधानसभा में पेश होगा नया बिल

मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा।

By Digital DeskEdited By: Himadri Singh Hada
Publish Date: Wed, 01 Jul 2026 07:20:49 PM (IST)Updated Date: Wed, 01 Jul 2026 07:20:49 PM (IST)
मध्य प्रदेश में UCC कानून से बाहर रह सकते हैं मतांतरित आदिवासी, विधानसभा में पेश होगा नया बिल
UCC कानून से बाहर रह सकते हैं मतांतरित आदिवासी। (AI से जेनरेट किया गया इमेज)

HighLights

  1. UCC कानून से बाहर रह सकते हैं मतांतरित आदिवासी
  2. आदिवासियों को कानून से बाहर रखने का तर्क
  3. विधानसभा में पेश किया जाएगा नया बिल

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक 20 जुलाई से प्रारंभ हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। इसमें आदिवासियों के साथ-साथ मतांतरित आदिवासी भी कानून के दायरे से बाहर रखे जा सकते हैं।

इस विषय को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई वाली समिति को जन परामर्श में बड़ी संख्या में सुझाव मिले हैं। अधिकतर का पक्ष है कि जब आदिवासी मतांतरित हो गया तो फिर उसे आदिवासियों को मिलने वाले अधिकार व सुविधा से वंचित रखा जाना चाहिए। सैद्धांतिक तौर पर सभी इससे सहमत भी हैं लेकिन समिति कानूनी प्रविधान देख रही है।


परंपराओं के कारण आदिवासियों को कानून से बाहर रखने का तर्क

जन परामर्श के दौरान भोपाल में पूर्व न्यायाधीश मोहन पी. तिवारी ने आदिवासियों को लेकर यह तर्क रखा था कि इनकी अपनी परंपराएं और व्यवस्थाएं हैं, इसलिए इन्हें कानून के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। जहां तक बात मत परिवर्तन करने वाले आदिवासियों की है तो वे मतांतरण के बाद आदिवासी तो रह नहीं गए। ब्राह्मण व सवर्ण जातियों के युवाओं से विवाह कर रहे हैं, फिर भी आदिवासी बने हुए हैं।

अंतरजातीय विवाह और यूसीसी लागू करने पर जोर

वनवासी कल्याण आश्रम के एसएस कुमरे ने भी इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज की लड़की अगर दूसरी जाति में विवाह करती है तो उस पर यूसीसी लागू होना चाहिए। इसी तरह के अन्य सुझाव भी आए हैं। सूत्रों का कहना है कि समिति में इस विषयों को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ है। कानूनी पहलू भी देखे गए।

संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का कानूनी पहलू

दरअसल, संविधान के प्रविधान अनुसार एसटी वर्ग के लिए धर्म आधारित कोई रोक-टोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि आदिवासी व्यक्ति किसी भी धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) को अपना ले, फिर भी वह कानूनी रूप से अपना एसटी का दर्जा और उससे जुड़े अधिकार बनाए रख सकता है। उनके जाति प्रमाण पत्र भी बनते हैं और आरक्षण का लाभ भी मिलता है।