
मुकेश विश्वकर्मा नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल: राजधानी भोपाल में मानवता को शर्मसार करने वाला एक ऐसा डेथ रैकेट सक्रिय है, जो चंद रुपयों के मुनाफे के लिए शहर की दो लाख से ज्यादा आबादी की सेहत को दांव पर लगा रहा है। नवदुनिया की टीम ने जब शहर के बाहरी इलाकों और पाश कॉलोनियों के पिछले हिस्सों की पड़ताल की, तो रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत सामने आई।
सरकारी और निजी अस्पतालों से निकलने वाला घातक 'बायो-मेडिकल वेस्ट' नियमानुसार इन्सीनरेटर (भट्टी) में जलने के बजाय कबाड़ियों की दुकानों तक पहुंच रहा है। यहां से यह संक्रमित प्लास्टिक रिसाइकिल होकर कई प्रकार के रूप में लोगों की रसोई और बच्चों के हाथों तक पहुंच रहा है।
बता दें कि यह सामग्री बायोमेडिकल वेस्ट की श्रेणी में आती है, जिसका वैज्ञानिक निपटान जरूरी है। खुले बाजार में इसकी खरीद-फरोख्त न सिर्फ कानूनन अपराध है, बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा भी है।
पड़ताल की शुरुआत अमरावद खुर्द गांव से हुई। यहां की संजीवनी क्लिनिक संक्रमण फैलाने का केंद्र बन चुकी है। क्लिनिक के ठीक बगल में शासकीय प्राथमिक शाला संचालित है, जहां पहली से आठवीं तक के मासूम बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल के खेल मैदान और क्लिनिक के पिछले हिस्से में मेडिकल वेस्ट का पहाड़ लगा है।
यहां इस्तेमाल की हुई सिरिंज, खून से सनी रुई, एक्सपायरी दवाओं के पत्ते और खाली कांच की शीशियां खुले में बिखरी पड़ी हैं। लंच ब्रेक के दौरान इन्हीं संक्रमित इंजेक्शनों और कांच के टुकड़ों के बीच बच्चे खेलते हैं। जरा सी चूक इन बच्चों को हेपेटाइटिस-बी, सी या एचआईवी जैसे जानलेवा रोगों का शिकार बना सकती है। प्रशासन ने क्लिनिक और स्कूल को एक ही परिसर में खोल तो दिया लेकिन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करना भूल गया।
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स्थान: अवधपुरी क्षेत्र। समय: दोपहर दो बजे, नवदुनिया रिपोर्टर ने एक बड़े कबाड़ी वाले से संपर्क किया और खुद को एक निजी अस्पताल का कर्मचारी बताया।
रिपोर्टर: अस्पताल का मेडिकल वेस्ट लेते हैं क्या?
कबाड़ीवाला: हां, ले लेंगे। बताओ क्या माल है?
रिपोर्टर: सब है इंजेक्शन, ग्लूकोज की बोतल, एक्सरे, सिरिंज और पाइप। करीब दो-तीन क्विंटल माल है।
कबाड़ीवाला: बिल्कुल ले लेंगे। ग्लूकोज की बोतल 30 रुपये, 40 रुपये और बढ़िया क्वॉलिटी हुई तो 70 रुपये किलो तक खरीद लूंगा। जैसा माल, वैसा दाम। मैं जो रेट दूंगा, वह पूरे भोपाल में कहीं नहीं मिलेगा। बस माल पहुंचा दो।
रिपोर्टर: भईया अभी कितने अस्पतालाें का माल ले रहे हो।
कबाड़ीवाला: माल दो से तीन महीने में आता है। नए भोपाल के कुछ अस्पताल हैं। मेरी टच में फोन लगा देते हैं हम चले जाते हैं।
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स्थान: बीडीए कॉलोनी, अमरावद खुर्द यहां टीम ने एक दूसरे कबाड़ी को जाल में फंसाया। इस बातचीत ने साबित कर दिया कि कबाड़ियों को पता है कि वे अपराध कर रहे हैं, फिर भी वे बेखौफ हैं।
रिपोर्टर: अस्पताल का कचरा खरीदते हो? एक्सरे और ग्लूकोज की बोतलें हैं।
कबाड़ीवाला: कौन से अस्पताल से आए हो? बोतलें खाली हैं न?
रिपोर्टर: अयोध्या नगर के पास से आया हूं। तीन अस्पतालों का माल है, करीब दो क्विंटल। रेट बताओ।
कबाड़ीवाला: देखो, एक्सरे 50 रुपये किलो, ग्लूकोज बोतल 20 रुपये और नली-पाइप पांच रुपये किलो लूंगा। खाली इंजेक्शन भी पांच रुपये किलो में ले लूंगा, लेकिन सुई (नीडल) हटा देना।
रिपोर्टर: ठीक है, माल ले आऊंगा।
कबाड़ीवाला: भैया, एक बात ध्यान रखना। सीधे मेरे पास आना, कहीं और मत भटकना। कोई कंपलेन कर देगा तो दिक्कत हो जाएगी। पुलिस और निगम की नजरों से बचाकर लाना।
रिपोर्टर: क्यों क्या हुआ पहले कोई फंसा है क्या।
कबाड़ीवाला: हां पिछले महीने की बात है अन्ना नगर के एक निजी अस्पताल से माल लिया था। नगर निगम की टीम आ गई थी। जितने का माल था उससे कहीं ज्यादा जुर्माना भरना पड़ा था।
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| मेडिकल कचरा | कबाड़ी का रेट (प्रति किलो, अनुमानित) | संभावित खतरा |
|---|---|---|
| एक्सरे फिल्म | 50 रुपये | सिल्वर और रसायनों के संपर्क से चर्म रोग का खतरा |
| ग्लूकोज की बोतल | 30 से 70 रुपये | रिसाइक्लिंग के बाद खाद्य बर्तनों में इस्तेमाल की आशंका |
| सिरिंज (बिना सुई) | 5 से 10 रुपये | रक्त जनित रोगों के सीधे संक्रमण का खतरा |
| ड्रिप पाइप/नली | 5 रुपये | घातक रसायनों का फैलाव |
नियमानुसार, हर अस्पताल को अपना मेडिकल वेस्ट अधिकृत संस्था को देना होता है, जिसके लिए वे शुल्क भी देते हैं। लेकिन मुनाफाखोरी के चक्कर में निजी अस्पताल संचालक दोतरफा खेल खेल रहे हैं। अधिकृत वैन को कचरा देने पर वजन के हिसाब से पैसा देना पड़ता है, इसलिए वे रिकॉर्ड में कम कचरा दिखाते हैं। बचे हुए कचरे (खासकर प्लास्टिक और कांच) को कबाड़ियों को बेचकर अस्पताल मोटा पैसा कमा रहे हैं।
वरिष्ठ सर्जन डॉ. रमेश कुमार बडवे के अनुसार मेडिकल वेस्ट का कबाड़ी तक पहुंचना पूरे समाज के लिए गंभीर खतरा है। अस्पतालों से निकलने वाली ग्लूकोज की बोतलें कबाड़ियों के पास जाती हैं। इन्हें धोकर दोबारा लोकल मार्केट में घटिया गुणवत्ता के घरेलू सामान, चाय और पानी की बोतलें बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। इससे आम लोग अनजाने में संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं।
अगर मेडिकल कचरा जमीन में दबा दिया जाए, तो उसमें मौजूद एंटीबायोटिक्स और रासायनिक तत्व भूजल को जहरीला बना देते हैं। ऐसे प्लास्टिक से कैंसर का खतरा बढ़ता है। इस तरह के दूषित प्लास्टिक के दोबारा उपयोग से हेपेटाइटिस और एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियां फैलने की आशंका रहती है।
एम्स भोपाल के माइक्रोबायोलाजी विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल वेस्ट में 'मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस' बैक्टीरिया होते हैं। अगर यह कचरा खुले में रहता है, तो हवा और आवारा पशुओं के जरिए यह संक्रमण घरों तक पहुंचता है। यह सीधे तौर पर कैंसर और किडनी फेलियर जैसी बीमारियों को न्योता देना है।
नियमों के मुताबिक, सभी निजी और सरकारी अस्पतालों को बायो-मेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निस्तारण के लिए अधिकृत डिस्पोजल कंपनी से टाइअप करना अनिवार्य है। इसके साथ ही उन्हें प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (पीसीबी) को वेस्ट डिस्पोजल का सर्टिफिकेट भी जमा करना होता है। यदि कोई अस्पताल अपना मेडिकल वेस्ट कबाड़ियों को बेच रहा है या खुले में फेंक रहा है, तो यह गंभीर अपराध है। हम समय-समय पर अस्पतालों का निरीक्षण कर कार्रवाई करते हैं।
-डॉ. मनीष शर्मा, सीएमएचओ, भोपाल
मेडिकल वेस्ट के निस्तारण में कबाड़ियों की कोई भूमिका नहीं है, इसे केवल अधिकृत एजेंसी को ही देना अनिवार्य है। यदि कोई अस्पताल नियमों का उल्लंघन कर कचरा बाहर बेचता है, तो पूरी जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन की होती है। हम ऐसे संस्थानों को चिह्नित कर उनके विरुद्ध सख्त वैधानिक कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।
-जेके राजौरिया, वैज्ञानिक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भोपाल