
दक्षा वैदकर, भोपाल। मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद और उससे जुड़ी अकादमियों में कर्मचारियों की नवीन पदस्थापना को लेकर जारी आदेशों और उनके बाद की कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि ट्रांसफर आदेश जारी होने के बावजूद संबंधित कर्मचारियों ने नई पदस्थापना पर ज्वाइनिंग नहीं की। संचालक संस्कृति के बार-बार आदेश जारी करने के बावजूद कर्मचारी पुरानी अकादमी छोड़ने को तैयार नहीं हुए। अंततः आदेश ही निरस्त करने पड़े।
सवाल यह है कि क्या संस्कृति परिषद में संचालक का आदेश भी कर्मचारियों की मर्जी का मोहताज है? यदि कर्मचारी ही तय करेंगे कि उन्हें कहां काम करना है, तो फिर प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों के आदेशों का औचित्य क्या रह जाता है? आरटीआई एक्टिविस्ट मिर्जा खावर बेग द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेज के अनुसार कुछ कर्मचारी वर्षों से एक ही अकादमी में जमे हुए हैं।
एक गौर करने वाली बात ये भी है कि एक तरफ कुछ कर्मचारियों के आदेश दो महीने में निरस्त कर दिए जाते हैं और उन्हें पसंदीदा जगह काम करने को मिल जाता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ कर्मचारियों के लिए आदेश जारी होते ही उनका नेमप्लेट हटा दिया जाता है, सारे अधिकार तुरंत वापस ले लिए जाते हैं। कर्मचारियों के बीच हो रहा ये भेदभाव कुछ अलग सवाल पैदा करते हैं।
जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी, सिंधी अकादमी, मप्र संस्कृति परिषद जैसे विभिन्न अकादमियों में कर्मचारियों की नवीन पदस्थापना के आदेश देने और बाद में उन्हें निरस्त करने के सवाल पर जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि जहां, जिसकी जरूरत थी, वहां उसे रखा गया। ऐसे में सवाल यह है कि जब किसी अकादमी में कर्मचारियों की जरूरत के आधार पर पदस्थापना का निर्णय लिया जाता है, तो आदेश जारी होने के बाद उसे बदलने या निरस्त करने की स्थिति क्यों बनती है?
परिषद में कर्मचारियों का स्थानांतरण नहीं किया जाता, बल्कि कार्य दायित्व बदले जाते हैं। किस कर्मचारी से कौन-सा काम लेना है या किसे कहां भेजना है, इसके लिए कोई निश्चित माडल या सिद्धांत निर्धारित नहीं है। जहां आवश्यकता महसूस होती है, वहां कर्मचारी को भेजा जाता है और जरूरत के अनुसार आदेश बदले भी जाते हैं। सारे कर्मचारी संस्कृति परिषद के हैं। हम ट्रांसफर नहीं करते, केवल कार्य दायित्व बदलते हैं। जहां जिसकी जरूरत लगती है, वहां उसे भेजते हैं। आदेश बदलना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।- एनपी नामदेव, संयुक्त सचिव, मप्र संस्कृति परिषद् एवं संचालक, संस्कृति संचालनालय
ना ही मैं ट्रांसफर करता हूं और ना ही रोकता हूं। ये मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। ट्रांसफर संस्कृति संचालक करते हैं।बेहतर है कि आप उनके सवाल करें। दरअसल ये सब निर्णय प्रशासन लेता है कि किसकी, कहां आवश्यकता है। कई बार आदेश को वापस भी ले लिया जाता है। वैसे ये समस्या सिर्फ इस अकादमी की नहीं, हर जगह की है। कर्मचारी बहुत कम है। - डा. धमेंद्र पारे, निदेशक, जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी।