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ब्रिटिश काल में जन्मजात 'अपराधी' घोषित विमुक्त जातियों का दाग धोएगी मप्र सरकार; जनजातीय अकादमी बनवा रही स्पेशल डाक्यूमेंट्री

मप्र की जनजातियों पर आधारित विशेष डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण शुरू किया गया है। प्रत्येक फिल्म की अवधि लगभग 12 मिनट होगी।

By Sushil PandeyEdited By: bhupendra Singh Rajput
Publish Date: Thu, 25 Jun 2026 08:39:17 AM (IST)Updated Date: Thu, 25 Jun 2026 08:52:58 AM (IST)
ब्रिटिश काल में जन्मजात 'अपराधी' घोषित विमुक्त जातियों का दाग धोएगी मप्र सरकार; जनजातीय अकादमी बनवा रही स्पेशल डाक्यूमेंट्री
प्रतीकात्मक चित्र, एआई से तैयार किया गया है।

HighLights

  1. विमुक्त और घुमंतू जनजातियों पर 12-12 मिनट की विशेष डाक्यूमेंट्री तैयार
  2. ब्रिटिश काल से चली आ रही "अपराधी" छवि को बदलने की कोशिश
  3. पारंपरिक हुनर, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक योगदान को मिलेगा मंच

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। प्रदेश सरकार विमुक्त, घुमक्कड़ और अर्ध-घुमक्कड़ जनजातियों के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह को बदलने के लिए अनूठा प्रयास कर रही है। मध्य प्रदेश जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी ने कुचबंदिया, पारधी, कालबेलिया, गाडुलिया लोहार और रबारी जनजातियों पर विशेष वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) बनवाना शुरू किया है।

12-12 मिनट अवधि वाली इन फिल्मों की शूटिंग का काम पूरा हो चुका है। मुंबई में पोस्ट-प्रोडक्शन का काम जारी है। इन फिल्मों के माध्यम से इस जनजातीय समाजों के हुनर और गर्व करने लायक विरासत को सामने लाने की कोशिश की जा रही है।


जन्मजात 'अपराधी' घोषित हैं समुदाय

बता दें, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत इन समुदायों को जन्मजात 'अपराधी' घोषित कर दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1952 में इस कानून को निरस्त कर इन्हें "विमुक्त" घोषित कर दिया गया।

कानूनी संरक्षण के बाद भी समाज, आम लोगों और यहां तक कि कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों के बीच इन्हें अकसर संदेह से ही देखा जाता है। इसी वजह से इस समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब भी समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पा रहा है।

यह भी पढ़ें- MP सरकार का बड़ा फैसला, बैगा, सहरिया और भारिया जनजाति के एक-एक गांव को 'आदर्श' बनाएगी सरकार

कभी राज-समाज का भी उपयोगी हिस्सा रहे हैं ये समुदाय

कुचबंदियाः एक खानाबदोश और घुमंतू जनजातीय समुदाय है। प्राचीन काल से मल्ल युद्ध के पारंगत, रस्सी पर चढ़ने के विशेष कौशल की वजह से किलों की घेराबंदी में सेनाओं के काम आते थे। मराठा सेनाओं के लिए गोह को प्रशिक्षित करते रहे हैं।

पारधीः मध्य भारत में निवास करने वाली यह जनजाति लोग पशुओं और जड़ी- बूटियों के जानकार होते हैं। बेहतरीन शिकारी और भौगोलिक रास्तों की जानकारी की वजह से मध्यकालीन सेनाओं में इन्हें पागी और पोर्टर के रूप में काम मिला हुआ था।

कालबेलियाः नौ नाथों में से एक कनिप्पा नाथ के अनुयायी हैं। सांपों के विशेषज्ञ। उनको पकड़ने और जहर उतारने की औषधियों के ज्ञान की वजह से समाज में काफी सम्मान मिलता रहा है। इनकी बनाई कलात्मक कथरी आज भी पसंद की जाती है।

गाडुलिया लोहारः प्राचीन काल से सेनाओं को अस्त्र-शस्त्र बनाकर देते थे। बाद में कृषि उपकरण और दैनिक जीवन की आवश्यकता के लौह उपकरण का निर्माण और विक्रय करने लगे।

रबारीः इन्हें राइका, देवासी, देसाई, या पालका भी कहा जाता है। यह पशुपालक जनजाति है। भेड़, ऊंट, गधी के दूध और ऊन की आपूर्ति करते थे।

ये वृत्तचित्र इन जनजातियों के प्रति बनी भ्रामक धारणा पर चोट करेंगे। यह भी दिखाएंगे कि ये समुदाय कभी हमारे समाज के लिए कितने उपयोगी थे। इनका पारंपरिक हुनर भी इसके केंद्र में है। - धर्मेंद्र पारे, निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी