
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। पर्यटन नगरी मांडू की पहचान बन चुकी दुर्लभ खुरासानी इमली (बाओबाब) को भौगोलिक संकेतक (जीआइ) टैग मिलने से धार जिले को एक और विशिष्ट पहचान मिल गई है। सदियों से आदिवासी समुदाय द्वारा संरक्षित इस अनूठे फल को अब कानूनी सुरक्षा, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और बेहतर बाजार मिलने का रास्ता खुल गया है।
खुरासानी इमली का मूल वृक्ष अफ्रीका का माना जाता है, लेकिन करीब 600 वर्ष पूर्व अफगान और अरब व्यापारियों के माध्यम से यह मांडू पहुंचा। यहां की जलवायु और मिट्टी में यह इस तरह रचा-बसा कि आज मांडू को भारत में बाओबाब वृक्षों का सबसे बड़ा प्राकृतिक क्षेत्र माना जाता है।
खुरासानी इमली का वृक्ष अपनी विशालकाय बनावट के कारण दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र है। इसकी मोटी संरचना हजारों लीटर पानी संग्रह कर सकती है और इसकी आयु हजारों वर्षों तक मानी जाती है। बिना पत्तियों की शाखाएं देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो पेड़ उल्टा लगा हो। स्थानीय लोग इसे मांडू इमली के नाम से जानते हैं।
खुरासानी इमली का गूदा विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट और खनिज तत्वों से भरपूर होता है। पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग पेट संबंधी रोगों, कब्ज, दस्त, बुखार तथा शरीर में ऊर्जा बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है। इसके बीज और छाल भी औषधीय उपयोग में आते हैं।
मांडू क्षेत्र में कभी लगभग एक हजार खुरासानी इमली के वृक्ष थे, लेकिन समय के साथ इनकी संख्या घटती गई। आदिवासी समुदाय ने इन्हें संरक्षित रखा और इन्हीं पेड़ों से फल बेचकर आजीविका अर्जित की। जीआइ टैग मिलने से इनके संरक्षण के प्रयासों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
"मांडू की इमली यानी खुरासानी इमली को जीआइ टैग मिल गया है। इस साल मांडू की इमली के साथ मालवा की चित्रकारी सहित कई उत्पादों को यह टैग मिला है। इससे धार जिले के मांडू के लोगों को फायदा होगा।" - डॉ. रजनी कांत, जीआइ टैग विशेषज्ञ व पद्मश्री
"मांडू की इमली के पेड़ों के संरक्षण के लिए वन विभाग सतत प्रयास कर रहा है। हम आगामी दिनों में इमली से औषधि तैयार करने के लिए प्रयास करेंगे।" - टी.आर. विजयानंदम, डीएफओ, धार
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