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    मांडू की दुर्लभ 'खुरासानी इमली' को मिला GI टैग, अब वैश्विक बाजार में बढ़ेगी आदिवासियों की आय

    Mandu Khurasani Imli GI Tag: धार की पर्यटन नगरी मांडू की पहचान बन चुकी दुर्लभ खुरासानी इमली (बाओबाब) को भौगोलिक संकेतक (जीआइ) टैग मिलने से धार जिले को...और पढ़ें

    By PremVijay PatilEdited By: Himadri Singh Hada
    Publish Date: Fri, 19 Jun 2026 10:01:16 PM (IST)Updated Date: Fri, 19 Jun 2026 10:32:24 PM (IST)
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    मांडू की दुर्लभ 'खुरासानी इमली' को मिला GI टैग, अब वैश्विक बाजार में बढ़ेगी आदिवासियों की आय
    मांडू की दुर्लभ 'खुरासानी इमली' को मिला GI टैग

    HighLights

    1. मांडू की दुर्लभ 'खुरासानी इमली' को मिला GI टैग
    2. अब वैश्विक बाजार में बढ़ेगी आदिवासियों की आय
    3. कभी एक हजार पेड़ थे, अब बचाने की चुनौती

    नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। पर्यटन नगरी मांडू की पहचान बन चुकी दुर्लभ खुरासानी इमली (बाओबाब) को भौगोलिक संकेतक (जीआइ) टैग मिलने से धार जिले को एक और विशिष्ट पहचान मिल गई है। सदियों से आदिवासी समुदाय द्वारा संरक्षित इस अनूठे फल को अब कानूनी सुरक्षा, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और बेहतर बाजार मिलने का रास्ता खुल गया है।

    600 वर्ष पुराना इतिहास और अनूठी बनावट

    खुरासानी इमली का मूल वृक्ष अफ्रीका का माना जाता है, लेकिन करीब 600 वर्ष पूर्व अफगान और अरब व्यापारियों के माध्यम से यह मांडू पहुंचा। यहां की जलवायु और मिट्टी में यह इस तरह रचा-बसा कि आज मांडू को भारत में बाओबाब वृक्षों का सबसे बड़ा प्राकृतिक क्षेत्र माना जाता है।


    खुरासानी इमली का वृक्ष अपनी विशालकाय बनावट के कारण दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र है। इसकी मोटी संरचना हजारों लीटर पानी संग्रह कर सकती है और इसकी आयु हजारों वर्षों तक मानी जाती है। बिना पत्तियों की शाखाएं देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो पेड़ उल्टा लगा हो। स्थानीय लोग इसे मांडू इमली के नाम से जानते हैं।

    औषधीय गुणों से भरपूर है यह दुर्लभ फल

    खुरासानी इमली का गूदा विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट और खनिज तत्वों से भरपूर होता है। पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग पेट संबंधी रोगों, कब्ज, दस्त, बुखार तथा शरीर में ऊर्जा बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है। इसके बीज और छाल भी औषधीय उपयोग में आते हैं।

    जीआइ टैग से होंगे ये बड़े फायदे

    • मांडू की खुरासानी इमली की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा।
    • कोई अन्य क्षेत्र इस नाम से उत्पाद बेचकर लाभ नहीं उठा सकेगा।
    • आदिवासी परिवारों और स्थानीय संग्राहकों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी।
    • इमली से बने पाउडर, जूस, कैंडी, जैम और स्वास्थ्य उत्पादों का उद्योग विकसित हो सकेगा।
    • पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नया आधार मिलेगा।
    • वृक्षों के संरक्षण और नए पौधरोपण को बढ़ावा मिलेगा।

    कभी एक हजार पेड़ थे, अब बचाने की चुनौती

    मांडू क्षेत्र में कभी लगभग एक हजार खुरासानी इमली के वृक्ष थे, लेकिन समय के साथ इनकी संख्या घटती गई। आदिवासी समुदाय ने इन्हें संरक्षित रखा और इन्हीं पेड़ों से फल बेचकर आजीविका अर्जित की। जीआइ टैग मिलने से इनके संरक्षण के प्रयासों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    विशेषज्ञों और अधिकारियों के वक्तव्य

    "मांडू की इमली यानी खुरासानी इमली को जीआइ टैग मिल गया है। इस साल मांडू की इमली के साथ मालवा की चित्रकारी सहित कई उत्पादों को यह टैग मिला है। इससे धार जिले के मांडू के लोगों को फायदा होगा।" - डॉ. रजनी कांत, जीआइ टैग विशेषज्ञ व पद्मश्री

    "मांडू की इमली के पेड़ों के संरक्षण के लिए वन विभाग सतत प्रयास कर रहा है। हम आगामी दिनों में इमली से औषधि तैयार करने के लिए प्रयास करेंगे।" - टी.आर. विजयानंदम, डीएफओ, धार

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