
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार की परमारकालीन भोजशाला पर वर्षों से चल रहे स्वामित्व विवाद में शुक्रवार को ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इसे वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी समाप्त ही नहीं हुई। यहां मिले साक्ष्य और स्थापत्य इसे वाग्देवी मंदिर सिद्ध करते हैं।
कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के उस आदेश को भी रद कर दिया जिसमें मुस्लिमों को भोजशाला में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी, यानी अब यहां नमाज नहीं पढ़ी जा सकेगी। हाई कोर्ट ने कहा कि कमाल मौला मस्जिद का विवादित क्षेत्र भी वाग्देवी का मंदिर ही है। मुस्लिम पक्ष चाहे तो राज्य शासन से धार जिले में कहीं और मस्जिद के लिए जमीन मांग सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भोजशाला का प्रशासन और प्रबंधन पहले की तरह एएसआइ के पास ही रहेगा। वह इसके संरक्षण, संवर्धन एवं धार्मिक प्रवेश को लेकर निर्णय ले सकेगा। लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी यहां की वाग्देवी की मूर्ति को लेकर कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार इस बारे में सार्थक प्रयास करे।
हाई कोर्ट ने इस मामले में 12 मई को सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रख लिया था। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने इसे शुक्रवार को जारी किया। इसी के साथ कोर्ट ने भोजशाला से जुड़ी पांच याचिकाओं और एक अपील का निराकरण कर दिया। मामले में मंदिर पक्ष की ओर से दो याचिकाएं- हिंदू फ्रंट फार जस्टिस और कुलदीप तिवारी के नाम से दायर थीं। इन दोनों को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।
कमाल मौलाना वेलफेयर सोसाइटी, अंतरसिंह दरबार एवं अन्य और सलेकचंद जैन की ओर से प्रस्तुत याचिकाएं निरस्त कर दी गई हैं। सोसाइटी ने भोजशाला को मस्जिद घोषित करने की मांग की थी। सलेकचंद जैन ने भोजशाला को जैन पाठशाला बताया था। इस बीच, मंदिर पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर दी है यानी हाई कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अगर कोई याचिका दायर होती है तो हिंदू पक्ष को सुने बगैर उसमें कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा।
अब नमाज नहीं, 24 घंटे पूजा कोर्ट ने एएसआइ के सात अप्रैल, 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें हिंदुओं के पूजा के अधिकार को सीमित करते हुए मुस्लिम समाज को नमाज के अधिकार दिए गए थे। अब मंदिर पक्ष को 24 घंटे पूजा का अधिकार मिलने और भोजशाला में नमाज प्रतिबंधित होने का रास्ता साफ हो गया है। निर्णय के आलोक में अब एएसआइ परिसर में पूजा और प्रवेश संबंधी नए नियम तय करेगा।
हिंदू पक्ष को पूजा के अधिकार मिलेंगे
कोर्ट ने कहा है कि उपलब्ध ऐतिहासिक, साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य स्थापित करते हैं कि उक्त स्थल मूलतः भोजशाला है, जहां देवी सरस्वती की उपासना की जाती रही है। इससे हिंदू पक्ष को पूजा के अधिकार मिल सकेंगे। - विष्णुशंकर जैन, वकील, हिंदू फ्रंट फार जस्टिस।
मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा
हाई कोर्ट ने केवल यह उल्लेख किया है कि यह परिसर मंदिर है लेकिन नमाज अदा करने पर रोक को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं की है। मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय जाएगा। - अब्दुल समद, सदर, कमाल मौलाना वेलफेयर सोसाइटी, धार।
एमपी हाई कोर्ट ने निर्णय में अयोध्या के श्रीराम मंदिर मामले का हवाला भी दिया है। कोर्ट ने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह द्वारा रखे गए उक्त फैसले में प्रतिपादित सिद्धांतों के दावे को भी आधार बनाया। कोर्ट ने माना कि किसी एक समुदाय द्वारा मात्र उपयोग करने से दूसरे समुदाय के धार्मिक दावे स्वतः समाप्त नहीं हो जाते। दावों की जांच ऐतिहासिक निरंतरता और साक्ष्यों के प्रकाश में की जानी चाहिए। कोर्ट ने 'वंस ए टेंपल आलवेज ए टेंपल' सिद्धांत को भी माना है।
कोर्ट ने यह भी माना कि पूजा स्थल अधिनियम-1991 एएसआइ संरक्षित धरोहरों पर लागू नहीं होता। इसमें कहा गया है कि वर्ष 1991 में जो जहां जिस पद्धति से पूजा-आराधना कर रहा होगा, वही लागू रहेगा इसलिए मस्जिद पक्ष का नमाज जारी रखने का तर्क खारिज हो गया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाई कोर्ट के निर्णय को सांस्कृतिक विरासत और आस्था का सम्मान बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन में पूर्ण सहयोग देगी और एएसआई के प्रबंधन में भोजशाला की गरिमा सुदृढ़ होगी। मुख्यमंत्री ने लंदन से मां वाग्देवी की प्रतिमा वापस लाने के अदालती निर्देश का स्वागत करते हुए राज्य सरकार की ओर से भी प्रयास करने की बात कही। वहीं, वरिष्ठ मंत्री प्रहलाद पटेल और जयभान सिंह पवैया ने इसे सनातन अस्मिता की बड़ी जीत बताया है।