
पुरुषाेत्तम शर्मा, नईदुनिया न्यूज, बदनावर (धार) : किसी बच्चे के चेहरे पर स्कूल आने का डर नहीं, होमवर्क अधूरा होने की चिंता नहीं, किताबों का बोझ नहीं...। यहां स्कूल की घंटी बच्चों के लिए पढ़ाई का संकेत कम और कुछ नया सीखने की खुशी ज्यादा है। खंडीगारा का शासकीय प्राथमिक विद्यालय इसी सोच के साथ सरकारी स्कूल की पारंपरिक छवि को बदलने की कोशिश कर रहा है। दो कमरों में चल रहे इस विद्यालय में 65 बच्चे पढ़ते हैं और तीन शिक्षिकाएं उन्हें किताबों के साथ संस्कार, रचनात्मकता और आत्मविश्वास का पाठ पढ़ा रही हैं।
विद्यालय में शिक्षिकाएं नीतू दुबे, चंदनबाला कुमावत और रानी राठौर ने पढ़ाई को गतिविधियों से जोड़ दिया है। नतीजा यह है कि पहली कक्षा में स्कूल आए बच्चों को अभी करीब दो माह ही हुए हैं, लेकिन वे अक्षरों की पहचान के साथ संस्कृत के श्लोक भी सुनाने लगे हैं। छोटी कक्षा के बच्चे बड़ी कक्षा की कविताएं सुनाते हैं और पांचवीं के बच्चे भी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी कविताएं प्रस्तुत करते हैं।
सुबह करीब 10 बजे स्कूल की शुरुआत होती है। पहले योग, प्राणायाम और प्रार्थना कराई जाती है। बच्चे संस्कृत के श्लोक, हनुमान चालीसा और अन्य पाठ का वाचन करते हैं। प्रतिदिन बच्चों को एक सुविचार सुनाने का अवसर दिया जाता है। इससे उनके भीतर मंच पर बोलने और अपनी बात रखने का आत्मविश्वास बढ़ रहा है। सोमवार को नया प्रेरणा गीत सिखाया जाता है, जिसे बच्चे पूरे सप्ताह दोहराते हैं।
यहां हाजिरी लगाना भी बच्चों के लिए खेल जैसा है। शिक्षिकाओं ने माचिस की खाली डिब्बियों पर बच्चों की तस्वीर और नाम लगाए हैं। बच्चा अपनी फोटो वाली डिब्बी पहचानकर स्वयं उपस्थिति दर्ज करता है। छोटी-सी यह गतिविधि बच्चों में पहचान, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता का भाव पैदा कर रही है।
शिक्षिकाओं का प्रयास है कि बच्चों के मन में पढ़ाई का डर पैदा न हो। होमवर्क दिया जाता है, लेकिन उसे बोझ नहीं बनने दिया जाता। जरूरत पड़ने पर विद्यालय में ही बच्चों का काम पूरा करवाया जाता है। दीवारों पर कविताएं, कहानियां और गतिविधियों से जुड़े पोस्टर लगाए गए हैं, ताकि बच्चे किताब के बाहर भी देखकर और समझकर सीख सके।
स्कूल में बच्चों के जन्मदिन भी सभी मिलकर मनाते हैं। परिसर में बच्चों और शिक्षिकाओं ने पौधे लगाकर फूलों की बगिया तैयार की है। बच्चे समय-समय पर पौधों की देखभाल करते हैं। परिसर के एक हिस्से को गोबर से लीपकर बच्चों से मांडने बनवाई जाती हैं, ताकि वे अपनी ग्रामीण संस्कृति और परिवेश से भी जुड़े रहे। शनिवार को ड्राइंग और अन्य रचनात्मक गतिविधियां कराई जाती हैं।
पहली से पांचवीं तक की पांच कक्षाओं के लिए विद्यालय में केवल दो कमरे हैं। संसाधन सीमित हैं, लेकिन सीखने के अवसर सीमित नहीं। तीन शिक्षिकाओं की कोशिशों से यहां औसतन करीब 80 प्रतिशत बच्चे नियमित स्कूल पहुंचते हैं। अभिभावकों का भरोसा भी बढ़ा है और शिक्षिकाओं का प्रयास है कि गांव के बच्चे, विशेषकर बच्चियां, निजी स्कूलों की ओर जाने के बजाय इसी सरकारी विद्यालय में अपनी पढ़ाई जारी रखें।
खंडीगारा का यह स्कूल बताता है कि शिक्षा केवल बड़ी इमारत, महंगी सुविधाओं और किताबों का नाम नहीं। कभी माचिस की एक डिब्बी भी बच्चे को जिम्मेदारी सिखा सकती है, एक पौधा संवेदना जगा सकता है और एक कविता आत्मविश्वास। शिक्षक दिवस पर इस विद्यालय की कहानी यही संदेश देती है कि जब शिक्षक बच्चों को केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि समझते हैं, तो दो कमरों का स्कूल भी बच्चों के सपनों के लिए बड़ा आसमान बन जाता है।