Bhojshala: राजा भोज के काल की विद्वत्ता और शिल्प वैभव की अद्भुत धरोहर है 1034 ईस्वी की वाग्देवी प्रतिमा, जानें किसने बनवाई प्रतिमा
Bhojshala: धार नगरी से प्राप्त वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा परमार कालीन कला, संस्कृति और विद्वत्ता की गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 15 May 2026 06:31:27 PM (IST)Updated Date: Fri, 15 May 2026 06:34:27 PM (IST)
वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा परमार कालीन कला, संस्कृति और विद्वत्ता की गौरवशाली परंपरा का प्रमाण है।HighLights
- 1875 में धार क्षेत्र के भग्नावशेषों से प्राप्त हुई थी
- यह प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली थी
- भार करीब 250 किलोग्राम माना जाता है
नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। धार नगरी से प्राप्त वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा परमार कालीन कला, संस्कृति और विद्वत्ता की गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह प्रतिमा विक्रम संवत 1091 अर्थात लगभग 1034 ईस्वी की बताई जाती है।
उच्च उत्कीर्णन शैली में निर्मित यह मूर्ति तत्कालीन मूर्तिकला कौशल की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है।इतिहासकारों के अनुसार यह प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली थी। देवी के सिर पर सुशोभित करण्ड मुकुट और सुसज्जित केश विन्यास उनकी दिव्यता तथा राजसी गरिमा को दर्शाते हैं।
1875 में धार क्षेत्र के भग्नावशेषों से प्राप्त हुई थी
प्रतिमा की कलात्मक बारीकियां इस बात का प्रमाण हैं कि राजा भोज के शासनकाल में धार कला, साहित्य और ज्ञान का प्रमुख केंद्र था। यह प्रतिमा वर्ष 1875 में धार क्षेत्र के भग्नावशेषों से प्राप्त हुई थी। इसके आधार भाग पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख विशेष महत्व रखता है।
“वररुचि” नामक विद्वान ने निर्माण करवाया
अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि “वररुचि” नामक विद्वान ने वाग्देवी सहित तीन जिन प्रतिमाओं का निर्माण करवाया था। इसके बाद फल-समृद्धि प्रदान करने वाली एक अन्य प्रतिमा बनवाई गई। अभिलेख में मूर्तिकार मणथल और लेखक शिवदेव का भी उल्लेख किया गया है।
वररुचि की पहचान प्रतिष्ठित विद्वान धनपाल के रूप में
इतिहासकार वररुचि की पहचान
राजा भोज के दरबार के प्रतिष्ठित विद्वान धनपाल के रूप में करते हैं। इससे यह प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं रह जाती, बल्कि उस दौर में धार में विकसित विद्वत्ता, साहित्यिक परंपरा और कला संरक्षण का भी सशक्त दस्तावेज बन जाती है।
भार करीब 250 किलोग्राम माना जाता है
आकार की दृष्टि से यह प्रतिमा लगभग 128.5 सेंटीमीटर ऊंची, 58.6 सेंटीमीटर चौड़ी और 26.5 सेंटीमीटर गहरी है। इसका अनुमानित भार करीब 250 किलोग्राम माना जाता है। इतनी विशाल और संतुलित संगमरमर प्रतिमा उस समय की तकनीकी दक्षता और कलात्मक परिपक्वता को रेखांकित करती है।
ब्रिटिश म्युजियम की एशिया दीर्घा में है वर्तमान में ये
वर्तमान में यह दुर्लभ प्रतिमा ब्रिटिश म्युजियम की एशिया दीर्घा में प्रदर्शित है, जहां इसे भारतीय मध्यकालीन मूर्तिकला की उत्कृष्ट धरोहर के रूप में देखा जाता है। विश्वभर के शोधकर्ता और कला प्रेमी इस प्रतिमा को राजा भोज कालीन सांस्कृतिक उत्कर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक मानते हैं।
वाग्देवी प्रतिमा के निर्माण से जुड़ी अहम जानकारी
- निर्माण काल : विक्रम संवत 1091
- अनुमानित निर्माण वर्ष : 1034 ईस्वी
- प्रतिमा वर्ष : लगभग 992 वर्ष पुरानी
- कहां मिलीः वर्ष 1875 में धार से प्राप्त हुई प्रतिमा
- कितनी भुजाएं हैंः मूल रूप से 4 भुजाओं वाली प्रतिमा
- प्रतिमा की ऊंचाई : 128.5 सेंटीमीटर
- चौड़ाई : 58.6 सेंटीमीटर
- गहराई : 26.5 सेंटीमीटर
- अनुमानित वजन : 250 किलोग्राम