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राहत बनी आफत: 'क्षतिपूर्ति बांड' के फेर में फंसा साइबर ठगी पीड़ितों का पैसा, निरस्त हो रहे आवेदन

ग्वालियर अपराध समाचार: केंद्रीय गृह मंत्रालय के आई4सी यानि इंडियन साइबर क्राइम को-ऑर्डिनेशन सेंटर की इस नई पहल के तहत राशि रिलीज कराने के लिए पीड़ित क...और पढ़ें

By amit mishraEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Fri, 14 Aug 2026 02:32:24 PM (IST)Updated Date: Fri, 14 Aug 2026 02:33:15 PM (IST)
राहत बनी आफत: 'क्षतिपूर्ति बांड' के फेर में फंसा साइबर ठगी पीड़ितों का पैसा, निरस्त हो रहे आवेदन

HighLights

  1. 1000 रुपये के स्टाम्प का पेंच
  2. MRM पोर्टल पर अमान्य हो रहे आवेदन
  3. दूसरे राज्यों से 10 गुना महंगा शुल्क

अमित मिश्रा, ग्वालियर। साइबर ठगी के शिकार लोगों को उनकी डूबी रकम जल्द वापस दिलाने के लिए शुरू की गई नई व्यवस्था अब खुद एक उलझन में फंस गई है। पहले जहां पीड़ितों को बैंक खाते में फ्रीज हुई राशि वापस पाने के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते थे, वहीं अब केंद्र सरकार के एमआरएम (मनी रिस्टोरेशन माडयूल) पोर्टल के जरिए 50 हजार रुपये तक की राशि को बिना कोर्ट गए अनफ्रीज करने की राहत दी गई है। लेकिन मध्यप्रदेश में यह पूरी प्रक्रिया 'क्षतिपूर्ति बांड' (इंडेमनिटी बांड) के एक बड़े पेंच में उलझकर रह गई है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के आई4सी यानि इंडियन साइबर क्राइम को-ऑर्डिनेशन सेंटर की इस नई पहल के तहत राशि रिलीज कराने के लिए पीड़ित को संबंधित बैंक में आवेदन के साथ 'क्षतिपूर्ति बांड' जमा करना होता है। लेकिन मुसीबत यह है कि मध्यप्रदेश में इस बांड की कीमत एक हजार रुपये तय है, पीड़ित 50-100 रुपये के स्टांप के साथ आवेदन प्रस्तुत कर रहे हैं।


इसे एमआरएम पोर्टल के जरिये पुलिस आगे बढ़ा रही है, लेकिन आवेदन निरस्त हो रहे हैं। इसकी वजह है- क्षतिपूर्ति बांड की कीमत मप्र में एक हजार रुपये। ऐसे में आवेदन निरस्त हो रहे हैं और पुलिस के पास फरियादी चक्कर काट रहे हैं। इस नियम में साइबर ठगी के पीड़ितों का पैसा फंस रहा है।

अज्ञानता और नियम की दोहरी मार

अधिकांश साइबर पीड़ितों को इस महंगे स्टाम्प शुल्क के नियम की सही जानकारी नहीं है। जब आवेदन वापस आने लगे, तभी पुलिस को यह पता लगा कि मप्र में क्षतिपूर्ति बांड की कीमत एक हजार रुपये है।

25 हजार या इससे अधिक की ठगी में भी ई-एफआईआर

अब लगातार ऐसे पीड़ितों की संख्या बढ़ रही है। इसकी वजह है- साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत करते ही मप्र का कोई नागरिक है और उसके साथ 25 हजार रुपये या इससे अधिक की ठगी होती है तो तुरंत ई-जीरो एफआईआर दर्ज होती है। अब इसकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। पहले यह सीमा एक लाख रुपये तक थी। खाते फ्रीज हो रहे हैं, रुपये रिफंड के लिए लोग थानों में पहुंच रहे हैं। पहले ही अपनी मेहनत की कमाई गवां चुके पीड़ित अब 1,000 रुपये का महंगा बांड बनवाने से परहेज कर रहे हैं।

बड़ा सवाल: जिन पीड़ितों की ठगी गई राशि 5,000 से 10,000 रुपये के बीच है, वे 1,000 रुपये का बांड और अन्य कागजी खर्च उठाने में हिचक रहे हैं। उनका मानना है कि इतनी छोटी रकम पाने के लिए फिर से इतना बड़ा खर्च करना न्यायसंगत नहीं है।

चक्कर काटने की मजबूरी

  • अमान्य आवेदनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे ठगी के शिकार लोगों को राहत मिलने की बजाय दोबारा परेशान होना पड़ रहा है। हर थाने में ऐसे पीड़ित पहुंच रहे हैं।
  • पड़ोसी राज्यों से 10 गुना अधिक अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश में क्षतिपूर्ति बांड की कीमत एक हजार रुपये 10 गुना अधिक शुल्क होने के कारण यह राहत योजना पीड़ितों के लिए परेशानी साबित हो रही है।

हां, यह सही है- इंडेमिनिटी बांड को लेकर आवेदन निरस्त हो रहे हैं। एक्ट के अनुसार इसके क्या समाधान हो सकते हैं, इस पर विचार किया जाएगा। फिर शासन को भेजेंगे, जल्द ही इसमें कुछ निर्णय लिया जाएगा। - प्रणय नागवंशी, एसपी, स्टेट साइबर पुलिस