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भाजपा ने दतिया चुनाव में प्रचार के लिए उतारी थी मंत्री, सांसद और विधायकों की बड़ी टीम, हार के बाद अब रणनीति और संगठन भी कठघरे में

BJP Datia Loss Analysis: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंड...और पढ़ें

By Balram SoniEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Tue, 04 Aug 2026 09:19:32 AM (IST)Updated Date: Tue, 04 Aug 2026 10:04:57 AM (IST)
भाजपा ने दतिया चुनाव में प्रचार के लिए उतारी थी मंत्री, सांसद और विधायकों की बड़ी टीम, हार के बाद अब रणनीति और संगठन भी कठघरे में

HighLights

  1. स्टार प्रचारकों की सभाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं
  2. टिकट बदलने के आधार और सर्वे पर भी सवाल
  3. भीतरघातियों पर कार्रवाई की तैयारी में भाजपा

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार ने पार्टी के सामने कई राजनीतिक और संगठनात्मक सवाल खड़े कर दिए हैं। यह केवल एक सीट का चुनाव नहीं था, बल्कि भाजपा ने इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था।

चुनाव प्रचार में उतरे थे सभी बड़े चेहरे

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित सरकार और संगठन के लगभग सभी बड़े ( प्रदेश के 12 मंत्री, 2 केंद्रीय मंत्री, 6 सांसद ' इनमें एक झांसी सांसद', 110 मौजूदा विधायक व मंत्री) चेहरे चुनाव प्रचार में उतरे, लेकिन इसके बावजूद पार्टी हार गई। चुनाव प्रचार के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बड़ौनी में सभा कर सिंधिया राजघराने और दतिया के पुराने संबंधों का हवाला देते हुए विकास कार्यों का भरोसा दिलाया।


'मामा' ने दूर बसे गांवों के विकास का बनाया था प्रमुख मुद्दा

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बसई में ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं, विशेषकर दतिया मुख्यालय से दूर बसे गांवों के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उदगवां और उपरायं में सभाएं कर प्रदेश सरकार की योजनाओं के आधार पर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की और कांग्रेस पर तीखे हमले बोले। मतगणना के नतीजों ने संकेत दिया कि इन सभाओं का अपेक्षित चुनावी लाभ भाजपा को नहीं मिल सका।

भीतरघात की तेज हो गई हैं चर्चाएं

भाजपा की हार के साथ ही संगठन में भीतरघात की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। मतगणना केंद्र पर ही भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने इशारों में कहा कि जो लोग भाजपा को मां कहते हैं, उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए। इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भी साफ किया कि पार्टी चुनाव परिणाम की समीक्षा करेगी और यदि किसी स्तर पर अनुशासनहीनता या भीतरघात सामने आता है तो संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी।

टिकट बदलने का दांव पड़ा उल्टा

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि टिकट परिवर्तन का निर्णय सर्वे के आधार पर लिया गया था और उसके बाद भी पार्टी चुनाव हार गई, तो इसका मतलब है कि या तो पार्टी का आंतरिक सर्वे जमीनी हकीकत को नहीं समझ पाया या फिर संगठन उस आकलन को वोट में बदलने में असफल रहा। चुनाव की एक और खास बात यह रही कि भाजपा ने सरकार और संगठन की पूरी ताकत दतिया में झोंक दी थी। मुख्यमंत्री, दो केंद्रीय मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष, कई मंत्री और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी लगातार चुनाव प्रचार और बूथ प्रबंधन में सक्रिय रहे।

भाजपा के लिए गंभीर आत्ममंथन का है अवसर

इसके बावजूद पार्टी लगातार दूसरी बार कांग्रेस से पराजित हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दतिया का जनादेश भाजपा के लिए केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता, टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व की कार्यशैली पर गंभीर आत्ममंथन का अवसर भी है। दूसरी ओर कांग्रेस इस जीत को 2028 विधानसभा चुनाव से पहले अपने लिए बड़े मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी में है।

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चुनावी फैक्टर

  • चुनाव में भाजपा का भीतरघात ही उसे ले डूबा।
  • कांग्रेस को क्षेत्र में दलित और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक ने पूरा साथ दिया।
  • भाजपा के टिकट बदलने का भी फायदा कांग्रेस को ही मिला।
  • क्षेत्र में कांग्रेस कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर जुटा रहा।
  • कांग्रेस नेताओं के गर्मजोशी भरे भाषणों ने भी जनता पर खूब असर छोड़ा।
  • ग्रामीण क्षेत्र में भी कांग्रेस पर मतदाताओं ने भरोसा जताया।
  • कांग्रेस, भाजपा पर भय और आतंक का माहौल फैलाने का आरोप समझाने में सफल रही।
  • ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में भी कांग्रेस की ओर जमकर रुझान रहा। वहीं भाजपा प्रत्याशी ग्रामीण क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाने में सफल नहीं हो सके।