ग्वालियर: 13 मिलिट्री ग्रासबीड़ पर बिजली परियोजना की सुगबुगाहट, सेना ने फिर उठाई 71 साल पुराने भूमि विवाद के नामांतरण की मांग
माना जा रहा है कि भविष्य में किसी भी विकास या अधोसंरचना परियोजना से पहले भूमि की कानूनी स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक होगा। यही वजह है कि वर्षों से लंबित ...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 07 Jul 2026 02:43:09 PM (IST)Updated Date: Tue, 07 Jul 2026 02:43:32 PM (IST)
एआई से बना चित्र।HighLights
- रक्षा संपदा कार्यालय ने जिला प्रशासन को लिखा पत्र
- क्षेत्रफल पर अलग-अलग दावे और वन विभाग की आपत्तियां
- सैन्य घोड़ों के चरागाह से फायरिंग रेंज तक का सफर
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर की 13 मिलिट्री ग्रासबीड़ (चरागाह भूमि) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इन क्षेत्रों में संभावित बिजली परियोजना की संभावना सामने आने के बीच सेना ने भूमि का रक्षा मंत्रालय के नाम नामांतरण और हस्तांतरण कराने की मांग दोहराई है। रक्षा संपदा कार्यालय भोपाल की ओर से जिला प्रशासन को भेजे गए पत्र में वर्ष 2016 में मुख्य सचिव स्तर पर हुई बैठक के निर्णयों का हवाला देते हुए लंबित प्रक्रिया पूरी कराने का आग्रह किया गया है। वर्ष 1955 में तत्कालीन ग्वालियर स्टेट द्वारा सेना को दी गई इन ग्रासबीड़ों का उपयोग वर्तमान में सैन्य प्रशिक्षण और फायरिंग रेंज के रूप में हो रहा है, जबकि भूमि अभिलेखों में स्वामित्व संबंधी प्रक्रिया अब तक अधूरी है।
ग्वालियर की 13 मिलिट्री ग्रासबीड़ के कुछ हिस्सों में बिजली परियोजना स्थापित किए जाने की संभावनाओं पर चर्चा चल रही है। इसी बीच सेना ने इन भूमियों के स्वामित्व संबंधी मामले को फिर से आगे बढ़ाया है। माना जा रहा है कि भविष्य में किसी भी विकास या अधोसंरचना परियोजना से पहले भूमि की कानूनी स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक होगा। यही वजह है कि वर्षों से लंबित नामांतरण प्रक्रिया को लेकर रक्षा विभाग ने प्रशासन को पत्र भेजा है। वर्ष 2025 में रक्षा सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी इन भूमियों की स्थिति और उपयोग की समीक्षा की गई थी। अब रक्षा मंत्रालय चाहता है कि भूमि रिकॉर्ड में आवश्यक संशोधन कर इन्हें औपचारिक रूप से उसके नाम दर्ज किया जाए।
घोड़ों के लिए बनी थीं, अब फायरिंग रेंज के रूप में उपयोग
वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश शासन के वन विभाग ने भारत सरकार को भेजे पत्र में बताया था कि ग्वालियर जिले की 13 मिलिट्री ग्रासबीड़ मूल रूप से तत्कालीन ग्वालियर रियासत द्वारा सैन्य घोड़ों के लिए घास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। वर्ष 1910 में जारी आरक्षित वनखंडों के इस्तहार तथा 1944-45 से 1954-55 के वर्किंग प्लान में इन्हें वन विभाग के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में शामिल बताया गया था।
वन विभाग के अनुसार, रक्षा विभाग द्वारा इन भूमि का उपयोग कभी घास उत्पादन के लिए नहीं किया गया और लंबे समय तक इनका प्रबंधन वन विभाग के पास ही रहा। वर्तमान में इन क्षेत्रों में वन क्षेत्र विकसित हो चुका है, जबकि कुछ हिस्सों का उपयोग सैन्य फायरिंग रेंज और प्रशिक्षण गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। इन क्षेत्रों का डिजिटल सर्वे और सीमांकन भी कराया जा चुका है।
क्षेत्रफल को लेकर अलग-अलग दावे
दस्तावेजों में दर्ज आंकड़ों के अनुसार भूमि क्षेत्रफल को लेकर विभिन्न अभिलेखों में अंतर है-
- रक्षा विभाग के मानचित्र के अनुसार : 71,141.86 एकड़
- डिजिटल मानचित्र के अनुसार : 76,684.46 एकड़
- संयुक्त सीमांकन के अनुसार : 41,475.19 एकड़
भूमि क्षेत्रफल में यह अंतर भी विवाद और नामांतरण प्रक्रिया के लंबित रहने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
कुछ हिस्सों के हस्तांतरण पर वन विभाग की आपत्ति
वन विभाग ने अपने पूर्व पत्राचार में स्पष्ट किया था कि देवगढ़ घासबीड़ क्षेत्र में स्थित रतनगढ़ माता मंदिर और उससे लगे लगभग 630 एकड़ वन क्षेत्र का हस्तांतरण संभव नहीं होगा। इसी प्रकार देवगढ़ किला तथा उसके आसपास के वन क्षेत्र को भी रक्षा विभाग को दिए जाने पर आपत्ति जताई गई थी।
71 साल पुराना मामला फिर निर्णायक मोड़ पर
रक्षा उपयोग, वन भूमि, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण तथा संभावित बिजली परियोजना जैसे पहलुओं के कारण 13 मिलिट्री ग्रासबीड़ का मामला अब केवल राजस्व रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रह गया है। सेना की नई पहल के बाद प्रशासनिक स्तर पर इस लंबे समय से लंबित विवाद के समाधान की दिशा में गतिविधियां तेज होने की संभावना है।