नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। नीति आयोग ने छह मई को देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक रिपोर्ट दी है। इसमें मध्यप्रदेश अन्य राज्यों से काफी पीछे है। यदि ग्वालियर जिले की बात करें तो यहां भी सरकारी स्कूलों के हालात ज्यादा ठीक नहीं हैं। जिले में इंटरनेट, कंप्यूटर सुविधा और स्मार्ट क्लास की जमीनी हकीकत ठीक नहीं है। जिले के अधिकांश स्कूल आधुनिक संसाधनों के मामले में अभी भी कोसों पीछे हैं।
कंप्यूटर हैं, पर सिस्टम फेल
जिले के स्कूलों की डिजिटल स्थिति का विश्लेषण करें तो आंकड़े विरोधाभासी नजर आते हैं। यूडाइस पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक कागजों पर जिले के 79.92 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर लैब और कंप्यूटर हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से केवल 74 प्रतिशत कंप्यूटर ही चालू हालत में हैं। शेष स्कूलों में या तो कंप्यूटर खराब पड़े हैं या फिर बिजली और रखरखाव के अभाव में धूल फांक रहे हैं। छात्रों को तकनीकी शिक्षा देने का लक्ष्य केवल एक कमरे में बंद कंप्यूटरों तक ही सीमित होकर रह गया है।
वहीं शहर के नामी निजी स्कूलों में जहां रोबोटिक्स और कोडिंग सिखाई जा रही है, वहीं सरकारी स्कूलों के बच्चों को कंप्यूटर आन करना भी नसीब नहीं हो रहा है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों जैसे भितरवार, डबरा और घाटीगांव के स्कूलों की स्थिति तो और भी दयनीय है। यहां बुनियादी ढांचे की कमी के कारण छात्र तकनीकी रूप से पिछड़ रहे हैं, जिसका सीधा असर उनके भविष्य और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर पड़ता है।
जिन स्कूलों में इंटरनेट व कंप्यूटर भी, उनका उपयोग केवल कार्यालयों के लिए
जिन सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर व इंटरनेट सुविधा है भी तो उसका उपयोग केवल स्कूल के विभिन्न कार्यालयीन कार्यों के लिए किया जाता है, क्योंकि जिले के स्कूलों में कंप्यूटर के बारे में बताने वाले या पढ़ाने वाले शिक्षक ही नहीं हैं।
स्मार्ट क्लास, केवल 18 प्रतिशत तक सीमित
शिक्षा को रोचक बनाने के लिए स्मार्ट क्लास (प्रोजेक्टर और डिजिटल बोर्ड) को सबसे प्रभावी जरिया माना जाता है। जिले के केवल 18 प्रतिशत स्कूलों में ही स्मार्ट क्लास की सुविधा है। शेष 82 प्रतिशत स्कूलों में आज भी वही पुरानी ब्लैकबोर्ड और चाक वाली पद्धति चल रही है।
केवल सांदीपनि स्कूल ही हैं, जिनमें स्मार्ट क्लास की सुविधा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश को इन सुविधाओं के मामले में पिछड़ा बताया गया है और ग्वालियर के ये आंकड़े उसी रिपोर्ट की तस्दीक करते हैं।
निजी मोबाइल डाटा व साइबर कैफे पर निर्भर शिक्षक
आज के दौर में बिना इंटरनेट के कंप्यूटर केवल एक टाइपिंग मशीन बनकर रह जाता है। जिले के स्कूलों में इंटरनेट की स्थिति और भी खराब है। जिले के केवल 55.59 प्रतिशत स्कूलों में ही इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध है यानी लगभग आधे स्कूलों में छात्र और शिक्षक सूचना की असीमित दुनिया से कटे हुए हैं। आनलाइन टीचिंग, डिजिटल लर्निंग मटेरियल और सरकारी पोर्टल्स पर डेटा अपडेट करने के लिए शिक्षकों को निजी मोबाइल डेटा या साइबर कैफे पर निर्भर रहना पड़ता है।
डीपीसी की सफाई...
शासन स्तर से स्कूलों में इंटरनेट व कंप्यूटर आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। जहां तक इंटरनेट सुविधा की बात है तो कई ग्रामीणों में क्षेत्रों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध नहीं हैं। - रविंद्र सिंह तोमर, डीपीसी।