
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। पुराने वाहनों का प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र बनवाने में ग्वालियर सहित चंबल क्षेत्र के वाहन मालिकों को परेशानी आ रही है। क्योंकि पुराने वाहनों के रजिस्ट्रेशन में जो मोबाइल नंबर दर्ज है, वह या तो बदल गया है या फिर गलत है। ऐसे में प्रमाण पत्र बनवाने के दौरान ओटीपी रजिस्टर्ड नंबर पर जाता है। जबकि वह नंबर मालिक के पास नहीं होता। ऐसे में पीयूसी बनाने वाले ऑनलाइन सॉफ्टवेयर में ओटीपी दर्ज नहीं हो पाता और पीयूसी नहीं बन पा रहा। वाहन मालिकों की परेशानी ये है कि पुलिस चेकिंग में यदि बिना पीयूसी के वाहन पकड़ा जाता है तो सीधे 10 हजार पांच सौ रुपये के चालान की चपत लगती है। ऐसे में वाहन मालिकों को उत्तर प्रदेश या राजस्थान से ये प्रमाण पत्र बनवाने पड़ रहे हैं।
केवल मध्य प्रदेश में ओटीपी की अनिवार्यता पीयूसी के लिए ओटीपी की यह अनिवार्य प्रक्रिया फिलहाल मध्य प्रदेश में ही लागू है। पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में बिना ओटीपी के भी प्रदूषण कार्ड बन रहे हैं। यह प्रमाण पत्र केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय के एम-परिवहन पोर्टल से बनता है। लेकिन मध्य प्रदेश आरटीओ से पंजीकृत प्रदूषण जांच केंद्र पर प्रमाण पत्र पर ही ओटीपी मांगा जाता है। वाहन मालिकों के फोन पर इसलिए नहीं आता ओटीपी - पुराने वाहनों के मामले में मालिकों को याद ही नहीं रहता कि कौन सा मोबाइल रजिस्टर्ड कराया था। क्योंकि वे इतने सालों में कई नंबर बदल चुके होते हैं। पहले यदि वाहन मालिक का नंबर नहीं मिलता था तो एजेंट किसी का भी मोबाइल नंबर रजिस्ट्रेशन फॉर्म में भर देते थे। प्रदूषण जांच केंद्र पर ऑनलाइन सॉफ्टवेयर में मोबाइल नंबर के आखिर के चार नंबर ही दिखते हैं। ऐसे में सही नंबर का पता ही नहीं चल पाता।
चाहे शहर हो, प्रदेश हो या फिर दूसरा प्रदेश हो, वाहन चेकिंग में पुलिस रजिस्ट्रेशन कार्ड, बीमा के साथ-साथ अब पीयूसी प्रमाण पत्र जरूर देखते है। यदि पीयूसी नहीं होता तो वाहन का साढ़े दस हजार का चालान किया जाता है। यदि किसी तरह चेकिंग में पुलिस कर्मियों को वाहन मालिक मैनेज भी कर ले तो भी हजार से दो हजार के बीच तो उसके खर्च हो ही जाते हैं। जबकि एक बार पीयूसी बनवाने पर महज 250 रुपये खर्च होते हैं और छह महीने तक यह मान्य रहता है। वाहन चालकों को नियमानुसार निर्धारित फीस जमा कर परिवहन विभाग में वाहन रजिस्ट्रेशन में दर्ज पुराने फोन नंबर की जगह नया नंबर दर्ज कराना चाहिए।
चूंकि इस प्रक्रिया में तीन से पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। इसलिए वाहन मालिक इस प्रक्रिया का पालन करते हुए दलालों से संपर्क कर उत्तर प्रदेश व राजस्थान से बिना वाहन को चेक कराए ही नियंत्रित प्रदूषण का प्रमाण पत्र बनवा लेते हैं। दलाल वाहन का फोटो लेकर इंटरनेट से अपने संपर्क वाले यूपी या राजस्थान के जांच केंद्र को भेज देते हैं। जहां से पीयूसी बनकर आ जाता है। यह हो रहा है नुकसान - स्थानीय प्रदूषण जांच केंद्रों से पीयूसी न बनने से एक तो प्रदेश के परिवहन विभाग को राजस्व का नुकसान हो रहा है। साथ ही स्थानीय पीयूसी बनाने वाले केंद्रों को भी कमीशन का नुकसान होता है। सबसे अधिक वाहन मालिकों को परेशानी होती है।
पीयूसी बनवाने के दौरान ओटीपी की व्यवस्था विभाग द्वारा की गई है। जिससे कोई भी एजेंट या अन्य बिना वाहन चेक कराए पीयूसी न बनवा पाए। इसके लिए वाहन मालिकों को विभाग में आकर अपना मोबाइल नंबर बदलवाना चाहिए। - विक्रमजीत सिंह कंग, क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी।
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