
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर: फंड की कमी से जूझ रहा नगर निगम की कंगाली का आलम यह है कि अपने कर्मचारियों को ही समय से वेतन-भत्तों का भुगतान नहीं कर पा रहा है। जैसे-जैसे संपत्तिकर की वसूली होती है, वैसे वेतन कर्मचारियों के खातों में डाला जाता है। ऐसे में अब नगर निगम द्वारा वेतन बांटने के लिए बैंक से कर्जा लिया जाएगा।
निगम की 20 करोड़ रुपये की FD पर 15 करोड़ रुपये तक की ओवरड्राफ्ट (OD) लिमिट 0.25 प्रतिशत ब्याज पर लेने का निर्णय लिया है। सोमवार को महापौर डॉ. शोभा सिकरवार की अध्यक्षता में हुई मेयर इन काउंसिल (MIC) की बैठक में इसे स्वीकृत करने की पुष्टि भी कर दी गई। नगर निगम द्वारा हर माह लगभग 18 करोड़ रुपये की राशि वेतन-भत्तों और पेंशन के रूप में कर्मचारियों के खातों में ट्रांसफर की जाती है।
बाल भवन के टीएलसी कक्ष में हुई MIC की बैठक में एजेंडा से अलग एक बिंदु विद्युत केबल खरीद के मामले में भी जांच कमेटी गठित की गई है। MIC सदस्य अवधेश कौरव ने मुद्दा उठाया कि विद्युत केबल खरीद के टेंडर खोलने के बाद अलग से कंपनियों से दस्तावेज लिए गए थे। ऐसे में इस मामले की जांच कराने की आवश्यकता है।
इस पर महापौर ने दो प्रभारी सदस्यों के साथ ही एक रिटायर अधिकारी को कमेटी में शामिल कर जांच कराने के निर्देश दिए। इससे पहले बैठक में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्यों की आरएफपी की शर्तों में संशोधनों की पुष्टि की गई।
रेत, भूसा, गिट्टी, पत्थर की शुल्क वसूली के लिए वर्ष 2023-24 की शेष अवधि की धरोहर राशि वापस करने के बिंदु पर MIC सदस्यों ने कहा कि निगमायुक्त को स्वयं ही इस मामले में निर्णय लेना चाहिए। MIC को क्यों इस मामले में फंसाया जा रहा है।
बैठक में मेयर इन काउंसिल सदस्य अवधेश कौरव, नाथूराम ठेकेदार, शकील मंसूरी, विनोद यादव माठू, गायत्री मंडेलिया, प्रेमलता जैन, संध्या कुशवाह, अपर आयुक्त टी. प्रतीक राव, प्रदीप तोमर, मुनीष सिंह सिकरवार, अपर आयुक्त वित्त रजनी शुक्ला आदि मौजूद थे।
स्मार्ट सिटी कार्पोरेशन द्वारा लगभग आठ करोड़ रुपये से पुनर्निर्मित किए गए हुजरात मार्केट की दुकानें तमाम प्रयासों के बावजूद बिक नहीं पा रही हैं। इन दुकानों को बेचने के लिए नगर निगम द्वारा पांच बार टेंडर प्रक्रिया की गई थी, लेकिन लोगों ने दुकानों को खरीदने में रुचि नहीं ली। ऐसे में निगम को राजस्व का नुकसान हो रहा था।
इसका तोड़ निकालते हुए MP अचल संपत्ति अंतरण नियम के प्रविधान देखे गए, जिसमें ये सामने आया कि पांच बार टेंडर होने के बाद भी यदि संपत्ति नहीं बिकती है तो उसे किराये पर दिया जा सकता है। ऐसे में निगमायुक्त ने MIC को हुजरात मार्केट की दुकानों को मासिक किराये पर देने की स्वीकृति का प्रस्ताव भेजा था।
इसे भी एमआईसी ने स्वीकृत कर दिया है, साथ ही निर्देश दिए कि निविदा आमंत्रण के बाद विस्तृत जानकारी MIC को भेजी जाए।
निगम की खराब वित्तीय हालत किसी से छुपी नहीं है। यही कारण है कि जनता से जुड़े हुए कार्य लगातार अटक रहे हैं। गली-मोहल्लों की सड़कें बनाने के लिए निगम के पास फंड नहीं है। मुख्य मार्गों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकतर कालोनियों, गली-मोहल्लों में सड़कें जर्जर स्थिति में हैं।
निगम की फागर और रोड स्वीपिंग मशीनों को नियमित रूप से नहीं चलाया जाता है। साफ-सफाई के साथ ही नाला व सीवर सफाई की नई मशीनों की खरीद नहीं हो पा रही है। निगमायुक्त संघ प्रिय ने ही गत वर्ष शासन को प्रस्ताव भेजकर 3050 करोड़ रुपये के विशेष बजट की मांग की थी।
इसमें से लगभग 150 करोड़ रुपये सड़कों के निर्माण के लिए ही मांगे गए थे। इसके अलावा भुगतान न होने के कारण ठेकेदार भी काम नहीं कर रहे हैं।
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