

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर-चंबल अंचल में विजयपुर और दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणामों ने भाजपा के रणनीतिकारों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोनों सीटें पहले कांग्रेस के पास थीं और उपचुनाव में कांग्रेस ने इन्हें बरकरार रखा, लेकिन भाजपा के लिए चिंता का विषय परिणाम से अधिक उसके पीछे छिपे राजनीतिक संकेत हैं।
सत्ता और संगठन की मजबूत स्थिति के बावजूद कांग्रेस का मुकाबले में टिके रहना बताता है कि अंचल में भाजपा के लिए सब कुछ सहज नहीं है। यही कारण है कि भोपाल से दिल्ली तक इन परिणामों के राजनीतिक अर्थों पर मंथन शुरू हो गया है।
भाजपा के सामने मूल सवाल यह है कि कांग्रेस के पास अंचल में फिलहाल कोई ऐसा सर्वमान्य चेहरा नहीं है, जिसकी अपील पूरे क्षेत्र में हो। संगठनात्मक ढांचे के लिहाज से भी भाजपा मजबूत है। इसके बावजूद कांग्रेस लगातार मुकाबला खड़ा करने में सफल हो रही है। ऐसे में कांग्रेस की कमजोरी के भरोसे चुनावी रणनीति बनाने के बजाय भाजपा अब अपनी कमजोर कड़ियों को तलाशने की कोशिश कर रही है।
ग्वालियर-चंबल की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया लंबे समय तक कांग्रेस का सबसे प्रभावशाली चेहरा रहे। 2018 के विधानसभा चुनाव में अंचल की 34 सीटों में कांग्रेस ने 28 पर जीत हासिल की थी, जबकि भाजपा छह सीटों पर सिमट गई थी। उस समय सिंधिया के नेतृत्व को कांग्रेस की बड़ी ताकत माना गया था। बाद में सिंधिया भाजपा में आ गए और उनके साथ कांग्रेस के कई विधायक भी भाजपा में पहुंचे।
राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद भाजपा को उम्मीद थी कि कांग्रेस अंचल में अपना प्रभाव खो देगी। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कई सीटों पर भाजपा को कड़ी चुनौती दी। इसके बाद विजयपुर और दतिया के उपचुनाव में कांग्रेस की जीत ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस का पारंपरिक वोट आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
अंचल के भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच वरिष्ठ नेताओं की आपसी प्रतिद्वंद्विता भी चर्चा का विषय है। ग्वालियर-चंबल में अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव क्षेत्रों और नेतृत्व के बीच वर्चस्व की राजनीति कोई नई बात नहीं है। समस्या तब बढ़ती है, जब इसका असर संगठन के सामान्य कामकाज और चुनावी प्रबंधन पर दिखाई देने लगे।कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि अंचल में भाजपा में आतंरिक प्रभुत्व को लेकर नेताओं के बीच राजनीतिक संघर्ष आंतरिक रूप से चल रहा है।
विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा के पास सुधार के लिए पर्याप्त समय है। विजयपुर और दतिया के परिणामों को पार्टी के लिए चेतावनी के संकेत के रूप में देखा जा रहाहै। भाजपा को अब यह देखना होगा कि अंचल में उसकी सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों का राजनीतिक संदेश मतदाताओं तक कितना प्रभावी पहुंच रहा है।
दूसरी ओर कांग्रेस इन परिणामों को अपने पुनरुत्थान के आधार के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। लगातार दो उपचुनाव जीतने से उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है और पार्टी को संगठन विस्तार का अवसर मिला है। हालांकि कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है। उसे इन जीतों को स्थायी जनाधार में बदलने के लिए बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना होगा और अंचल में प्रभावी नेतृत्व की कमी को दूर करना होगा।
ग्वालियर-चंबल में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन और व्यापक नेतृत्व नेटवर्क है। लेकिन यही ताकत तब कमजोरी में बदल सकती है, जब अलग-अलग नेताओं के प्रभाव क्षेत्रों के बीच समन्वय का अभाव हो। इसलिए पार्टी के लिए अब केवल संगठन को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक समन्वय और साझा रणनीति भी जरूरी होगी। विजयपुर और दतिया के नतीजे को नजरअंदाज करना भाजपा के लिए भी आसान नहीं होगा।