
उदय प्रताप सिंह, नईदुनिया, इंदौर। घरों में बची व एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक दवाओं का उचित निस्तारण जरूरी है। जानकारी के अभाव में कई बार शहरवासी सूखे कचरे के साथ घर में रखी अनुपयोगी दवाएं व एक्सपायर हो चुकी दवाएं डाल देते हैं, जबकि गीले व सूखे कचरे के मुकाबले दवाओं के कचरे का निस्तारण अलग से किया जाता है। इंसीनरेटर में इसे नष्ट किया जाना चाहिए।
ठीक तरीके से इन दवाओं का निस्तारण नहीं होने के कारण कई बार ये पेयजल तक भी पहुंच जाता है। इस तरह पेयजल के जरिए यह मनुष्यों तक भी पहुंचकर हानि पहुंचाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में एनसीआर, उत्तर प्रदेश, मैसूर व बेंगलुरु जैसे शहरों में हुई जांच में भूजल में एंटीबायोटिक का प्रदूषण है। हालांकि अभी इंदौर व मप्र में इस तरह की जांच ही नहीं हुई है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की गाइडलाइन के मुताबिक फार्मा और अन्य उद्योगों के ईटीपी से छोड़े जाने वाले पानी में हानिकारक तत्वों के साथ एंटीबायोटिक की जांच भी होनी चाहिए। सुनिश्चित करना मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारी है। इंदौर कार्यालय के पास पानी में एंटीबायोटिक की जांच की सुविधा ही नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि पानी में एंटीबायोटिक की जांच कैसे की जाएगी।
इंदौर, पीथमपुर में संचालित फार्मा कंपनियों को अपने परिसर में दवा युक्त पानी को एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) में ट्रीट करना अनिवार्य है। कुछ कंपनियां इस व्यवस्था का पालन नहीं करती हैं। इसी तरह शहर के अस्पतालों के लिए भी अनिवार्य है कि वे अपने परिसर में दवा मिले पानी को ईटीपी में ट्रीट करें। कई अस्पताल तो इसका पालन करते हैं लेकिन कुछ अस्पताल दवा मिश्रित पानी सीधे ड्रेनेज लाइन में डाल देते हैं।
फार्मा उद्योग व अस्पतालों द्वारा बिना ट्रीट किए ड्रेनेज लाइन में छोड़ा जाने वाला पानी सीवरेज लाइन में पहुंचता है और यह वहां से कबीटखेड़ी ट्रीटमेंट प्लांट पहुंचता है। कई बार यह दूषित पानी नालों से होता हुआ कान्ह नदी तक पहुंचता है। गंभीर नदी में इसी तरह नाले का दूषित पानी पहुंच रहा है। गंभीर नदी का पानी यशवंत सागर में आता है। अत: दवा मिश्रित पानी पेयजल व कई बार भूजल को भी दूषित करता है। इस तरह का पानी पीने वालों में दवाओं के प्रति प्रतिरोध क्षमता भी बढ़ जाती है।
शहर में वितरित होने वाले नर्मदा पेयजल व घरों के नलकूपों के पानी की जांच के दौरान बैक्टीरिया की जांच होती है। पानी में एंटीबायोटिक रजिस्टेंट बैक्टीरिया की जांच भी होनी चाहिए। लैब में इस तरह की जांच होती है। इससे यह पता चलता है कि आपके पीने के पानी में एंटीबायोटिक दवाओं का प्रदूषण तो नहीं है। शहर में ट्रेंचिंग ग्राउंड, फार्मा कंपनियों व अस्पतालों के आसपास के नलकूपों के पानी में साल में एक बार एंटीबायोटिक दवाओं के प्रदूषण की जांच होनी चाहिए।
शहर के सभी अस्पतालों से प्रतिदिन मेडिकल वेस्ट एकत्र कर हम उसे इंसीनरेटर में नष्ट करते हैं। कई बार घरों से दवाओं को वेस्ट सूखे कचरे के साथ पहुंचता है। नगर निगम के माध्यम से यह वेस्ट हमें मिलता है और हम इसे नष्ट करते हैं। अस्पतालों व फार्मा कंपनियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपना दवा मिश्रित पानी दूषित पानी अपने परिसर में बने एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट कर सीवरेज में छोड़ें। - अशद वारसी, संचालक, हास्विन इंसीनरेटर
देश के कई शहरों के भूजल में यह मिला
एंटीबायोटिक भूजल को प्रदूषित कर रहे हैं। सिप्लोफ्लाक्सासिन व ओफ्लोक्सासिन व एजिथ्रोमाइसिन केमिकल भूजल में पहुंच गए हैं। अस्पताल व आम लोग कई बार इन दवाओं को खाली मैदान में फेंक देते हैं या नाले के पास फेंक देते हैं। ऐसे कचरों के डम्पिंग यार्ड जिनमें नीचे कांक्रीट, एचडीपीई, जियो टेक्सटाइल फैब्रिक से बिछाना चाहिए। ऐसा न करने पर वहां दवाओं को डंप करने से दवाएं मृदा में जाती हैं और वहां से यह भूजल में जाती हैं। देश के कई शहरों में भूजल में ये पाए गए हैं। इंदौर में भी अभी जानकारी नहीं है लेकिन नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वास्थ्य विभाग, ग्राउंड वाटर बोर्ड को शहर के नलकूपों व नर्मदा पेयजल में भी एंटीबायोटिक दवा के प्रदूषण की जांच करनी चाहिए। - सुधीन्द्र मोहन शर्मा, पूर्व राष्ट्रीय नोडल अधिकारी पेयजल सुरक्षा, भारत सरकार