
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भोजशाला विवाद में वर्षों तक धार्मिक दावे और ऐतिहासिक संदर्भ प्रमुख आधार बने रहे, लेकिन इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा स्थापत्य और पुरातात्विक साक्ष्यों की हुई। एएसआई की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मामला केवल आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थापत्य संरचना, शिलालेखों और पुरातात्विक अवशेषों की व्याख्या पर केंद्रित हो गया।
हाई कोर्ट के आदेश पर एएसआई ने परिसर का करीब 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया। इस दौरान ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार, खुदाई, संरचनात्मक अध्ययन और तकनीकी परीक्षण किए गए। सर्वे के बाद एएसआई ने 2000 से अधिक पेज की रिपोर्ट अदालत में पेश की।
एएसआई रिपोर्ट में परिसर के भीतर 106 स्तंभ और 82 प्लास्टर का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इनकी स्थापत्य शैली मंदिर संरचना से मेल खाती है। कई स्तंभों पर नक्काशी, आकृतियां और अलंकरण पाए जाने का उल्लेख किया गया, जिन्हें हिंदू स्थापत्य शैली का हिस्सा बताया गया।
हिंदू पक्ष ने इन्हीं साक्ष्यों को मूल मंदिर संरचना का सबसे बड़ा प्रमाण बताया। उनका दावा रहा कि बाद में बनी संरचना में पूर्ववर्ती मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया।
एएसआई रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों का जिक्र किया गया। इनमें कई अभिलेख नागरी लिपि में बताए गए और उनका संबंध परमारकालीन शासन से जोड़ा गया। रिपोर्ट के अनुसार ये अभिलेख अरबी-फारसी लेखों से पुराने हैं। यहीं से विवाद का केंद्र धार्मिक दावों से आगे बढ़कर ऐतिहासिक कालक्रम और स्थापत्य क्रम पर पहुंच गया। अदालत में यह बहस भी हुई कि कौन सी संरचना पहले की है और परिसर का मूल स्वरूप क्या था।
सर्वे रिपोर्ट में मूर्तियों, टूटे अवशेषों और मंदिर शैली की स्थापत्य सामग्री मिलने का भी उल्लेख किया गया। कई आकृतियों और मूर्तियों को क्षतिग्रस्त अवस्था में मिलने की बात कही गई। एएसआई ने यह भी कहा कि वर्तमान ढांचे में पूर्ववर्ती संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग हुआ प्रतीत होता है।

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भोजशाला विवाद लंबे समय तक धार्मिक और राजनीतिक बहस के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन वैज्ञानिक सर्वे के बाद चर्चा का केंद्र पुरातत्व और स्थापत्य अध्ययन बन गया। अदालत में केवल आस्था नहीं, बल्कि तकनीकी रिपोर्ट, संरचनात्मक विश्लेषण और अभिलेखीय साक्ष्यों पर भी विस्तार से सुनवाई हुई।