• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • Mutual Funds मास्टरी
  • होम
  • मध्य प्रदेश
  • इंदौर

भागीरथपुरा कांड : जिम्मेदारी की फाइल भी ‘गायब’, नगर निगम और आईडीए एक-दूसरे पर फोड़ते रहे ठीकरा

भागीरथपुरा दूषित जल कांड की मप्र हाई कोर्ट में पेश हुई जांच आयोग की रिपोर्ट ने केवल जलापूर्ति व्यवस्था की खामियां ही नहीं, जिम्मेदारी तय करने की व्यवस...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Thu, 01 Oct 2026 09:14:00 PM (IST)Updated Date: Thu, 01 Oct 2026 09:14:00 PM (IST)
भागीरथपुरा कांड : जिम्मेदारी की फाइल भी ‘गायब’, नगर निगम और आईडीए एक-दूसरे पर फोड़ते रहे ठीकरा
भागीरथपुरा में बदली गई पाइप लाइन। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. आयोग के सामने अलग-अलग स्तर के अधिकारी अपनी भूमिका से बचते नजर आए
  2. अधिकारी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहे
  3. नगर निगम और आईडीए दस्तावेजों के लिए एक-दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ते रहे

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : भागीरथपुरा दूषित जल कांड की मप्र हाई कोर्ट में पेश हुई जांच आयोग की रिपोर्ट ने केवल जलापूर्ति व्यवस्था की खामियां ही नहीं, जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था की कमजोरी भी उजागर कर दी है। आयोग के सामने अलग-अलग स्तर के अधिकारी अपनी भूमिका से बचते नजर आए और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहे।

सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना और जल-सीवरेज व्यवस्था को सुरक्षित रखना नगर निगम की मूल जिम्मेदारी है। आयोग ने रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया है। लापरवाही का आलम यह कि नगर निगम और आईडीए दस्तावेजों के लिए एक-दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ते रहे।


भागीरथपुरा की पाइप लाइन से जुड़े मूल नक्शे, वर्क आर्डर, निरीक्षण रिकार्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज न नगर निगम के पास मिले न आइडीए के पास। तीन दशक पुरानी जल-सीवर व्यवस्था के रखरखाव और निगरानी की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी, इसे लेकर भी आयोग को रिकार्ड के अभाव में पड़ताल करनी पड़ी।

अधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते रहे। आयोग ने रिपोर्ट में लिखा भी है कि यह किसी एक अधिकारी की गलती नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही और निगरानी की कमी का मामला है। जिस व्यवस्था का काम जनता को साफ-स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना थी वह घटना के बाद अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए रास्ते तलाशती रही।

निगमायुक्त मौके पर जाकर निरीक्षण नहीं करते हैं

मेरे कार्यकाल के दौरान भागीरथपुरा को लेकर कोई शिकायत या रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। यदि मानकों का पालन किए बिना लाइन डाली तो समस्या आ सकती है। निगमायुक्त मौके पर जाकर परीक्षण नहीं करते हैं। यह काम तकनीकी टीम करती है। -मनीष सिंह, पूर्व निगमायुक्त

घटना से जुड़े पूरे तथ्य पता नहीं

मेरे समय भागीरथपुरा में दूषित पानी की कोई शिकायत सामने नहीं आई थी। पानी की गुणवत्ता को लेकर भी कोई रिपोर्ट नहीं पहुंची थी। सीवरेज लाइन से जुड़ी शिकायत मिलने के बाद टेंडर की प्रक्रिया शुरू की गई थी। घटना से जुड़े पूरे तथ्य पता नहीं हैं, इसलिए इस बारे में कुछ नहीं कह सकते। -आशीष सिंह, पूर्व निगमायुक्त

31 सैंपल लिए थे, 25 फेल हो गए थे

घटना के बाद आपात बैठक बुलाने का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है। घटना के बाद पानी के 31 सैंपल लिए थे। इनमें से 25 फेल थे। संबंधित काम पूरा करने में देरी हुई। ठेकेदार को एक साल में काम पूरा करना था, लेकिन समय पर काम नहीं हुआ। ठेकेदार पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। देरी क्यों हुई, इसका कारण स्पष्ट नहीं है। सीवर और पानी की लाइन पास-पास होना गलत है। 30 और 31 दिसंबर को 73 सैंपल लिए गए थे। इनमें से 55 सैंपल फेल हुए और 39 में फीकल कोलीफार्म बैक्टीरिया पाए गए। -क्षितिज सिंघल, निगमायुक्त

दूषित पानी के पीछे कोई दूसरा कारण भी हो सकता है

कार्यपालन इंजीनियर और अन्य अधिकारी प्रशासनिक रूप से निगमायुक्त के प्रति जिम्मेदार थे, मेरे प्रति नहीं। घटना की जानकारी मिलते ही तेजी से कार्रवाई की गई। दूषित पानी की शिकायतों पर भी तुरंत कदम उठाए गए। मेरी अंतरात्मा मानती है कि दूषित पानी के पीछे कोई दूसरा कारण भी हो सकता है। आसपास मौजूद उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट की वजह से पानी दूषित होने की आशंका भी है। इस बिंदु पर भी जांच होना चाहिए। -रोहित सिसोनिया, तत्कालीन अपर आयुक्त

घटना को रोका जा सकता था

मेरे कार्यकाल में मेयर हेल्पलाइन पर 31 शिकायतें मिली थीं। इसी दौरान करीब 2.65 करोड़ रुपये के काम की मंजूरी दी गई थी। भागीरथपुरा में मेंटेनेंस के लिए कोई लिखित आदेश जारी नहीं किए गए थे। निर्देश मौखिक रूप से दिए गए थे। कार्यकाल में किसी अधिकारी, कर्मचारी या ठेकेदार पर कार्रवाई नहीं हुई। समय रहते लाइन की मरम्मत और सुधार हो जाता, तो घटना को रोका जा सकता था। -अभिषेक गेहलोत, पूर्व अपर आयुक्त

समाधान के बाद शिकायत बंद कर दी थी

24 अक्टूबर 2025 को भागीरथपुरा क्षेत्र से गंदे पानी की शिकायत मिली थी। इसके बाद सब इंजीनियर और सहायक इंजीनियर को जरूरी निर्देश दिए थे। शिकायत का समाधान होने और संतुष्टि मिलने के बाद उसे बंद कर दिया गया। क्षेत्र के आसपास औद्योगिक इकाइयां मौजूद हैं। ऐसे में हानिकारक केमिकल सीवरेज के जरिए पेयजल में मिलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। आसपास लघु उद्योग भी हैं, जहां से अपशिष्ट निकलता है। -संजीव श्रीवास्तव, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर

2022 से ही आ रहा था दूषित पानी

वर्ष 2022 में ही दूषित पानी की शिकायत की जानकारी मिल गई थी। फरवरी 2024 में भी उल्टी-दस्त की शिकायत सामने आई थी। इसके बाद ही स्पष्ट हो गया था कि भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी आ रहा है। इस संबंध में पत्र भी लिखे थे। महापौर और अधिकारियों ने निरीक्षण कर पाइप लाइन बदलने के आदेश भी दिए थे। -कमल वाघेला, स्थानीय पार्षद

आईडीए ने बिछाई थी भागीरथपुरा में लाइनें

आईडीए ने वर्ष 1990 से 1995 के बीच भागीरथपुरा क्षेत्र में सीवर लाइन बिछाई थी। आयोग ने आईडीए के अधिकारियों से इस काम के रिकार्ड बुलवाए थे, लेकिन आईडीए कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं करा सका। आईडीए का कहना है कि यह रिकॉर्ड नगर निगम को सौंपा जा चुका है, जबकि निगम का कहना है कि रिकॉर्ड पुराना होने से नष्ट हो गया था। सवाल तो यह उठ रहा है कि आखिर बगैर रिकॉर्ड के नगर निगम भागीरथपुरा में लाइनों का रखरखाव कैसे कर रहा था।

यह भी पढ़ें- इंदौर दूषित जल कांड की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, भूजल तक पहुंचा था मलमूत्र का जानलेवा बैक्टीरिया, NGT ने 3 सप्ताह में मांगा जवाब